रिश्तों के
रखाव में
सहजता का
अभाव क्यूँ...?
सुना था
बचपन से
नर-नारी
आपस में
दोस्त कभी
हो नहीं सकते
बिना किसी
नियत नाम के
समाज में
विचरण
कर नहीं सकते
स्त्री के हैं
नियमित रिश्ते
पिता, भाई,
पति और बेटा
इनसे पृथक
कोई भी रिश्ता
उसको
इज़्ज़त
नहीं है देता
सती कहा जाता
द्रौपदी को
हुए मित्र
सबसे अच्छे
जिसके
स्वयं पालनहार
धरा के
किसुन-कन्हाई
संग थे उसके
पांचाली को
कहते कृष्णा भी
कृष्ण की
अभिन्न सखी
थी वो...
हर उस लम्हा
बने थे संबल
खाविन्दो के झुंड
में भी
जब होती अकेली
थी वो ....
कौरवों की
घृणित चौकड़ी में
हारे थे जब
पाँचों पांडव
मर्दों के उस
लोलुप ज़ज़्बे का
कैसा घटित
हुआ था तांडव
द्रौपदी को
लगा दाँव पे
नैन झुकाए
बैठे थे सब
लाज बचाई
मित्र ने उसकी
करुंण हृदय
चीत्कार उठा जब
नहीं लांच्छित
हुआ वो रिश्ता
नहीं मापदंड था
उसका कोई
फिर क्यूँ सब
डरे से रहते
नाम ढूँढ कर
देते कोई
समाज की
संकीर्ण सोचों में
वह महासती
कहाँ है खोई
कृष्ण के
हर रिश्ते के
कुदरती होने के
एहसास का..
नहीं समाज पर
प्रभाव क्यूँ???
रिश्तों के
रखाव में
सहजता का
अभाव क्यूँ...?
6 टिप्पणियां:
best relationship in the world is friendship & u hv best paid ur tributes thru ur woderful words.....
आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 28 - 07- 2011 को यहाँ भी है
नयी पुरानी हल चल में आज- खामोशी भी कह देती है सारी बातें -
naye visay ko lekar achchi kavita.
एक कृष्ण से रिश्ते को समाज कब स्वीकार कर सका है? हमारी सोच ही ऐसी है की नियत रिश्तों से इतर कोई जुड़ा तो समाज ने उसको कोई नाम दे दिया और फिर उसको कालिख की तरह से फैला दिया. ये हमारे मन का पाप ही तो है की रिश्ते के बिना कोई नाम दिए स्वीकार करसकें.
एक नए विषय पर लिखा बहुत अच्छा लगा पढ़कर.
सुन्दर अभिव्यक्ति....
सादर..
बेहद खूबसूरत रचना. आभार.
सादर,
डोरोथी.
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