गुरुवार, 17 जनवरी 2019

बस बात अपने संग की


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सुलगती है दिलों में
अधूरी सी बात
अधूरी मुलाकात
दे दें ना हवा
साँसों की
भड़क उठें शोले
हो जाये फ़ना
अधूरापन सारा
हो मुक़म्मल
हर बात
हर मुलाकात अपनी.....

पसरी है निगाहों में
अधूरी सी आस
अधूरी रही प्यास
बरसा दें ना बादल
नेह का
भीग जाए अंतस
बुझ जाए प्यास
पूरी हो हर आस
हो पुरसुकूँ हयात अपनी...

कर देती है
मन तन पावन
अगन हवन की
जल धार गंग की,
हो जाएं हम कुंदन
हवन में तप कर
या बहें सरस
हो कर तरल
बस बात अपने संग की....

गुरुवार, 10 जनवरी 2019

सांझे से हम

छोटे छोटे एहसास
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हँसी तेरे होठों की
खिलती है मेरे वजूद में
कसक मेरे दिल से उठ
छलकती है तेरी पलकों पे
ये सांझे से दुख
ये सांझी सी खुशियां
और सांझे से ख्वाब तेरे मेरे
हो गए हैं न सबब
जीने का अपने ......

पराया तो नहीं था


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दिल को ऐसे कभी कोई, भाया तो नहीं था
एक पल को भी वो लगा,पराया तो नहीं था...

हमख़याल हमनज़र तो थे हमसफ़र हो चले
मंज़िल-ए-मक़सूद में बदलाव, आया तो नहीं था .....

घुल गईं रूहें खो कर वजूद जिस्मों का
जुदा एक दूजे से अब कोई ,साया तो नहीं था.....

कशिश मोहब्बत की खींच लायी या रब
तेरे दर पर मुझे और कोई ,लाया तो नहीं था ......

सात समंदर पार हों या नज़र के सामने
करीब दिल के इतना किसी को, पाया तो नहीं था .....

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

अर्पण तुझको ए मीत !!...




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पुष्प अक्षरों के
चुन चुन कर
भावों के धागे में
गुंथ कर
सृजित हुआ
जो गीत ,
अर्पण तुझको
ए मीत !!!.....

देश काल
पद नाम
सकारे,
नहीं प्रभावी
मध्य हमारे ,
जोड़ा हमको
इक अनाम ने
व्यर्थ हुई
हर रीत ,
अर्पण तुझको
ए मीत !!!....

हर पल जीते
साथ यूँ अपना
अंतराल तो
बस एक सपना
मापदंड से परे
घटित हुई
तेरी मेरी प्रीत ,
अर्पण तुझको
ए मीत !!!....

वरदान तुझे
विस्मृति का
अभिशाप मुझे
स्मृति का
वरदान छुपा
अभिशापों में
ज्यूँ छुपी
हार में जीत
अर्पण तुझको
ए मीत !!!......

रविवार, 6 जनवरी 2019

खुशियों का आगाज़ सुनो !!


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सर्द रातों में
कोहरे की चादर से
ढके माहौल को
धुंधलाती आँखों के परे
महसूसते हुए
होती है सरगोशी अक्सर
कानों में
"मेरी आवाज सुनो"!

यूँ बदहवास बेचैन सी
ढूंढती हो किसे
डाले हुए बोझा
अपने अहम का
दूसरों के वहम का,
कभी तो लौटो
जानिब खुद के,
दबे हुए इस बोझ तले
"मेरे अल्फ़ाज़ सुनो"!!

ओढ़ लिए हैं क्यों
आवरण
दूसरों की पसंद के
नकली फूलों सी सजी हो
किसी गुलदान में
खिलने दो बिखरने दो
गुंचा-ए-रूह को
ना मुरझाओ यूँ
"मेरा एतराज़ सुनो"!!

गुनगुना लो खामोशियों को
गूंज उठे हर सिम्त
सुर तुम्हारे होने का
थिरकते हुए
धड़कनों की ताल पर,
फड़फड़ा कर पंखों को अपने
छू लो न आसमाँ
"मेरी परवाज़ सुनो"!!!

ए मेरे हमनफस,
ए हमनशीं !!
परों सी हो के हल्की
बारिश की बूंदों सी
तरल हो के
थाम के हाथ मेरा
जीस्त का राज़ सुनो
दर्द का साज़ सुनो
खुशियों का आगाज़ सुनो
"मेरी आवाज सुनो"!!!

मंगलवार, 1 जनवरी 2019

"होना" मेरे होने में


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उकेर दी हैं
उस निपुण ने
लकीरें हथेलियों पर मेरी ,
लिख दिए है
खाते कई
देना पावना के
मिलन बिछोह के
खोए पाए के ,
जाने कितनी सदियों से
चुका रही हूं कर्ज़
कुछ उतरते है 
कुछ नए चढ़ जाते हैं ....

छुपा देता है
हर जन्म में
बड़ी ही निपुणता से
तुम्हें इन लकीरों में,
दिखते नहीं
फिर भी
तुम्हारे होने का एहसास
करता है पूर्ण
अस्तित्व को मेरे ,
झलकता है
यह अनदेखा
अनजाना सा
'होना'
मेरे होने में ....

समझ जाती हूँ मैं
शाश्वत है
मिलन अपना
होते हुए मुक्त
ऋण बंधनों से.....

रविवार, 23 दिसंबर 2018

मिजाज उलाहनों के !!



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होते हैं मिजाज कई
उलाहनों के ,
दिखते  है अक्स उनके
मक़सद और असर के
देने और पाने वालों के
रिश्तों के आइनों में,
या उभर आते हैं वे
जीने के कई अन्दाज़ हो कर....

होती हैं कुछ उम्मीदें
हमारे अपनों की ,
देते हैं उलाहने जब
उनके पूरा न होने पर
ज़ाहिर होता है
अपनापन उनका,
हो जाते हैं हम होशमंद
उनकी उम्मीदों के ख़ातिर
करने लगते हैं परवाह
और ज़्यादा
उनके जज़्बातों की.....

होते हैं कुछ उलाहने
अना और ग़ुरूर से लदे
तँज़ में पगे
ख़ुदगर्ज़ी में डूबे भी...
करने को साबित गलत
दूसरों को
दिखाने को नीचा औरों को,
ले लेना असर ऐसे उलाहनों  का
कर देता है बेतरतीब सोचों को
होते हैं ऐसे उलाहने पराये,
बचाये रखने के लिए खुद को
रहने देना होता है
बस पराया ही उनको....

और कभी कभी होते है उलाहने
मात्र रेचन ,
अपनी ही
नकारात्मक मनस्थिति के ,
नहीं होता है
कोई लेना देना इनका
किसी अन्य की गतिविधि से
करता है निर्भर
पाने वाले पर
इस नकारत्मकता का
अंत या विस्तार.....

होते है ना प्रेम भरे
झूठे से उलाहने कई
देने और पाने वालों को
गुदगुदाते हुये
उन्हें 'होने' का अहसास देते हुये
निरर्थकता ही उनकी
दे देती है अर्थ अनूठे
रिश्तों के गहरेपन को,
संबंधों की जीवंतता को,
मुस्कुराते हैं सभी
उलाहनों की चुहलबाज़ी पर
बिना किसी गिले शिकवों के
बहते हुये ये झरने प्यार के
भिगो जाते है रूहों को  ....

होता है मौन भी
उलाहना अनकहा
जब न आये कोई
पुकारने पर बार बार ,
ना दिखे कोई
जब हो तमन्ना ए दीदार,
तकी जाए राह हो के बेक़रार
झरोखे से झांका जाए बारंबार
करके अख़्तियार चुप्पी
रहे किसी के आने का इंतज़ार
दिल से दी जाए एक सदा
"आ मना ले मुझे ...ख़फ़ा हूँ मैं"....