बुधवार, 13 नवंबर 2019

आघात.......


--------

समझ लेते हैं
जिसे आघात हम
होता है वह शिल्प
उस निपुण संगतराश का,
तराश रहा होता है जो
अनगढ़ पत्थर में छुपे
बेढब जमावड़ों में ढके
हमारे सुगढ़ मूल स्वरूप को
धारदार छेनी की
कभी हल्की
कभी तीखी चोटों से...

दिखती है प्रकट में
करते हुए आघात छेनी ही
तोड़ते हुए आडम्बरी वजूद को
किन्तु है वो तो
एक उपकरण मात्र
रचयिता के सधे हुए हाथों में
करता है जिसका उपयोग
वो सर्वशक्तिमान
उकेरने को खुद का ही स्वरूप
किसी मनपसंद पात्र को चुन कर.....

कृतज्ञता हमारी
मूर्तिकार के प्रति
छेनी के प्रति
और इस अस्तित्व के प्रति
दे सकती है ताक़त
सहने की हर आघात को
पी लेने की हर दर्द को,
तभी तो उतरता है
परमात्मा
अपने समग्र रूप में
अपनी सम्पूर्ण संवेदना के साथ .....

शनिवार, 9 नवंबर 2019

जागृत रवि.....


****************
घेर लिया था
अवसाद की बदली ने
अलसाई  सर्द सुबह के
सोए हुए से सूरज को,
होते ही जागृत
अपने तेज और प्रकाश के प्रति
हुआ था प्रकट रवि
बिखेरते हुए लालिमा चहुं ओर
बदलते हुए स्वरूप
उस धूसर सी बदली का
अपने चमकते सुनहरी रँग से...


के तुम आओगे .......

#######
शम्मे वफ़ाओं की जलाए बैठी हूँ  , के तुम आओगे
अश्क़ पलकों में छुपाए बैठी हूँ ,के तुम आओगे...

खामोशियाँ इक दूजे तक पहुंची हैं मगर अब
आस गुफ़्तगू की लगाए बैठी हूँ ,के तुम आओगे ....

धड़क उठता है दिल मेरा ज़रा सी जुम्बिश पे
नज़र यूँ राह में तेरी ,बिछाए बैठी हूँ के तुम आओगे....

नहीं कटते जुदाई में यूँ तन्हा शाम ओ सहर
तस्सवुर की हसीं महफ़िल,सजाए बैठी हूँ ,के तुम आओगे ...


हो हर धड़कन में ,साँसों में,समाए रूह में मेरी
खुद को खुद ही से चुराए बैठी हूँ के तुम आओगे....

नहीं थे तुम लकीरों में मेरे हाथों की ये माना
जो था लिक्खा , सब कुछ मिटाए ,बैठी हूँ के तुम आओगे....

है रोशन ये जहां सारा तेरे आने की आहट से
दरीचों के दिये मस्नूई ,बुझाए बैठी हूँ ,के तुम आओगे....

मायने:
गुफ़्तगू-बातचीत
जुम्बिश-हलचल
तस्सवुर-कल्पना
मस्नूई-बनावटी/पाखंडपूर्ण

मंगलवार, 15 अक्तूबर 2019

शरद पूर्णिमा......

*************
शरद की गुलाबी चादर में लिपटा
स्निग्ध धवल सुधाकर
लिए है मादकता
अपने मिलन के पलों की..

रुपहली चांदनी में
कलकल करती नदिया तीरे
दिखते दो बदन
पिघल रहे थे
चंद्र किरणों की तपिश से,
सरिता के शीतल नीर की छुअन
कर रही थी प्रज्ज्वलित
अगन हृदय में ,
प्रतिबिम्ब मयंक का
झिलमिलाते जल में
लग रहा था ज्यूँ
स्वयं निशापति
उतर आये हैं झूम कर
चूमने युगल पाँवों को..

छुए बिना देह
उतर गए थे
हम रूहों में एक दूजे की
गमक रहा है वजूद
तब से
रात की रानी की तरह,
दैदीप्यमान है आभामंडल अपना
समा जाने से हममें
शरद पूनो के चाँद का.....

शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2019

इश्क़ के परचम बेहतर हैं .....


*************
तेरी नज़रों से देखा ,पाया कुछ तो हम बेहतर हैं
तुझसे फिर भी जानेजां कुछ तो हम कम बेहतर हैं

डरना क्या अब ज़ख्मों से ,दर्द दवा हो जाएगा
दुश्मन के खंजर से तो यारों के मरहम बेहतर हैं...

ख़्वाबों की ताबीर में ना बर्बाद किया हमने क्या क्या
दुनिया की फ़ितरत से यारब अपने दमख़म बेहतर हैं..

मर्कज़ में जा कर ,खुद को पाना ही तो मंज़िल है
महवर पर ही घूम रहे क्यूँ कहते तुम हम बेहतर हैं....

रोज़ के शिकवे ,मायूसी, ये दर्द भरे नाले तौबा
ज़हरीले अमृत पीने से आबे जमजम बेहतर हैं....

ना भरमाओ दर्द छुपा कर दिल की दिल से निस्बत है
लबों पे झूठी मुस्कानों से चश्मे पुरनम बेहतर हैं.....

चर्चे सुन कर गली गली ,सुकूँ दिलों पे तारी है
गुमनामी की मौत से अपने इश्क़ के परचम बेहतर हैं...

मायने:

ताबीर-पूरा करना/complete
मर्कज़-केंद्र/centre
महवर-परिधि/circumference
आबे-जमजम-मक्का का पवित्र पानी
निस्बत-लगाव/connection
चश्मे-पुरनम-भरी हुई आंख/teary eyes
तारी-छाया हुआ/spreaded
परचम-झण्डा/flag

मंगलवार, 1 अक्तूबर 2019

साहिल कर दिया


***************
इश्क़ तुझसे क्या हुआ
तुझको ख़ुदा के
मुक़ाबिल कर दिया,
मुंतज़िर थे डूबने को
बहर में कब से
लहरों ने जिसकी
हमें साहिल कर दिया.....

ओ रंगरेजवा


#######
ओ रंगरेजवा !
रंग दीनी किस बिध
चूनर तूने कोरी रे ,
दिठे मैली
जग को चुनरिया
जुग बीते ना धोई रे ,
एक बावरिया
बिसार के जगति
रंग तोहरे मां खोई रे,
मैली थी जहँ
धोया जबनि
बहा रंग
तोहरे इसक का रे
चाक जहँ थी
तहँ सी लई हम ने
सूत हमरे नेह का रे.....