मंगलवार, 25 सितंबर 2018

क्या कहिये .....


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किया ज़िन्दगी में शामिल
हमपे ये इनायत क्या कहिये...
सरे बज़्म छेड़ती हैं
आँखों की शरारत क्या कहिये ...

नज़रों से समेटा मुझको
मूँद ली फिर पलकें
महबूब का मेरे, वल्लाह
अंदाज़े हिफाज़त क्या कहिये ....

ख़ामोशी ज्यूँ गा रही है
धड़कन में बसी ग़ज़लें
दरिया-ए - जज़्बात के
बहने की नफ़ासत क्या कहिये.....

रूहों का मिलन अपना
तोहफ़ा है इलाही का
तू मैं हूँ के मैं तू है
अपनी ये शबाहत क्या कहिये .....

रोशन है हर इक ज़र्रा
मशरिक़ से उठा सूरज
इक नूर बरसता है
इस दिन की वज़ाहत क्या कहिये.....

मायने -
शबाहत -similarities
वज़ाहत - भव्यता/सुंदरता

भूलना मुझको भी आसान नहीं...


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उदास हो रही है ख़ामोशी
सुन के उसको ,
कुछ उसको सुना कर जाना.....

भूलना मुझको भी
आसान नहीं है हमदम
मेरी यादों से मगर
खुद को मिटा कर जाना.....

सोमवार, 24 सितंबर 2018

छुअन...

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छुअन से
तेरे एहसासों की
पिघल रहा है
वजूद मेरा
और
बह रहा है
बाज़रिया आँखों के

रविवार, 23 सितंबर 2018

अनागत



झलक दिख जाए
अनअपेक्षित उसकी
रोम रोम में
सिरहन है
प्रतीक्षा में अनागत की
हो गयी पगली
बिरहन है.......

बुधवार, 19 सितंबर 2018

कसक और महक


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एक कसक
तुझसे दूर होने की
एक महक
तुझमें खुद को खोने की

दिखती दोनों ही नहीं
किसी को भी
बात है बस रूह के
महसूस होने की.......

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

नैहर

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छूट जाता है
बचपन
उस आँगन के
छूटने  के साथ ही
जहाँ खेली थी
लाडली
गुड्डे  गुडिया ....

जीती है
यथार्थ
जिसमें
जीवन नहीं
खेल
महज़
गुड्डे गुडिया का ...

किन्तु
जाते ही
नैहर
मिलती है
छाँव जब
माँ के आँचल की
बन जाती है
फिर से
वही नन्ही बच्ची
होती है
खुश जो
नन्हीं नन्ही 
बातों पर .......

छूट जाता है
जब वो ही नैहर
होते ही
दिवंगत
माता -पिता के
होने लगता है
एक बेटी को
महसूस
कि जैसे
छीन ली हो
किसी ने
वो धरती
जहाँ थी
उसकी जड़ें
जहाँ बीता था
उसका अनमोल
बचपन .....

तपते सूरज से
किसी पल में
तरसती है
फिर लाडो
अपना कहे
जाने वाले
किसी सुखद
ठौर के लिए
जहाँ मिल सके
उसे
माँ के आँचल की सी
शीतल छाँव ....

और हो जाती है
तब वो
हमेशा के लिए
बड़ी ......

रविवार, 16 सितंबर 2018

पागलपन


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मेरे पागलपन में
तेरा
यूँ पागलों सा
घुल जाना ,
समझदारी को
करता है
अक्सर
मजबूर
देखने को आइना .....😊