मंगलवार, 18 जून 2019

पत्थर भी पिघल जाए.....


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मुमकिन है मोहब्बत से तशद्दुद भी बदल जाये
देख कर फ़ितरते मोम पत्थर भी पिघल जाए.....

बर्क लहराई थी शामे वस्ल जो तेरी आँखों में
नूर में उसके मेरी शबे हिज्र भी  ढल  जाए.....

जिस्मे पत्थर में खुद को छुपा लूँ कितना
ख़ुश्बू-ए-रूह बिखरने को फिर भी मचल जाए....

नज़रों से दूर मगर मुझमें बसे रहते हो
इक इसी बात पर मेरा दिल भी बहल जाए....

टूट कर जाऊँ बिखर वो पत्थर तो नहीं मैं
वजूदे मोम हूँ जो किसी साँचे में भी ढल जाए.....

बीमारे इश्क़ की ना पूछना खैरियत यारों
दिखे महबूब तो तबियत भी सम्भल जाए.....

मायने:
तशद्दुद-कठोरता/aggression
बर्क़-बिजली/lightening
शामे वस्ल-मिलन की शाम
शबे हिज्र-जुदाई की रात

शनिवार, 8 जून 2019

बाकी है अभी....


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बारहा मिले और बिछड़े, सोज़े हयात बाकी है अभी
अपनी रूहों के मिलन की करामात बाकी है अभी ....

सहर होते ही हो जाएंगे रुख़सत तारे
चाँदनी में नहा लें ,के रात बाकी है अभी.....

दफ़अतन मिले वो सरे राह  सलाम भी ना हुआ
धड़कने बोल उठी ताल्लुकात बाकी है अभी .....

करेंगे राब्ता तुमसे पा लें ज़रा जवाब सभी
दिल में बहुत से सवालात बाकी है अभी ......

वक़्त-ए-फुरसत पे रुख़ इधर करना
अपनी अधूरी सी  मुलाकात बाकी है अभी.....

जाने को दूर मुझसे, रच ली हैं साजिशें तुमने
हिस्सा हूँ मैं तेरा ये ख़यालात बाकी है अभी ......

ज़िन्दगी मैंने तो जी है  ईदो दीवाली की तरह
साज़ ए दिल छेड़ो  जश्ने वफ़ात बाकी है अभी .....

मायने:
बारहा-बार बार
सोज़े हयात-ज़िन्दगी की आँच
दफ़अतन-अचानक
राब्ता-मेल मिलाप
जश्ने वफ़ात-मौत का उत्सव

रातों को जगा रक्खा है ....


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तेरे ख़यालों में ज़ेहन को, गिरफ़्तार करा रक्खा है
आज़ादी पे ख़ुद अपनी, पहरेदार बिठा रक्खा है ....

खाई है कसम उसने, ना देखने की मुझको
तस्वीर मेरी को मगर ,सीने से लगा रक्खा है .....

जताते हो तुम ऐसे, के हम कुछ नहीं तेरे
नज़रे दुनिया से मगर, दिल में छुपा रक्खा है.....

वादा था मिलेंगे ना, यक बार भी अब हम
साँसों में एक दूजे को ,अब भी बसा  रक्खा है.....

मुझको भुलाने वाले ,तेरी यादों का सितम कैसा
इक तस्सवुर ने तेरे,मेरी रातों को जगा रक्खा है.....

छोटे छोटे एहसास


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लाज़िम* नहीं
तेरा होना
तेरे होने के लिए,
काफ़ी है
इक ख़याल ही
मेरे खोने के लिए

लाज़िम-आवश्यक/ज़रूरी

सोमवार, 3 जून 2019

छोटे छोटे एहसास


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ज़िन्दगी हँसती है
साथ तू हो जब राहों में
तेरे बिना भी तो देख
जिये जा रहे हैं हम,
संजो कर यादें तेरी
हर लम्हा ज़ेहन में अपने
काम दुनियावी बदस्तूर
किये जा रहे हैं हम.......

शनिवार, 1 जून 2019

रतजगे कह रहे....


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आईना जब जब निहारती हूँ मैं
अक्स उसका ही ढालती हूँ मैं...

रतजगे कह रहे मेरी आँखों के
उसके ख़्वाबों में जागती हूँ मैं....

जाने कूचे से कब गुज़र जाए
रस्ता उसका यूँ ताकती हूँ मैं..

हर सफ़े पे नाम है उसका
यूँ किताबे जीस्त बाँचती हूँ मैं....

अपनी चाहत का असर ना पूछो
जिस्म दो ,इक रूह मानती हूँ मैं....

उम्र-ए-आख़िर में वो मिला मुझको
जिसको जनमों से जानती हूँ मैं ....

शुक्रवार, 31 मई 2019

इस घर जब तक डेरा है


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आयी थी मैं
उतर कर आसमाँ से
किया था बसेरा
एक देह में
बनी थी जो एक घर मेरा
समझना था मुझे खुद को
पड़ गया था
मेरे और तेरे का
अजीब घेरा.....

जुड़े थे रिश्ते नाते कई
घर के द्वार और दीवारों से
दे दिए थे नाम उपनाम कई
मुझे भी सबने
भांति भांति के व्यवहारों से...

निभा रही थी जिम्मेदारियां
हर नाम लक्षण के अनुरूप
भूल बैठी इस जद्दोजहद में
हा ! मैं खुद अपना ही स्वरूप....

आने लगे थे मेहमाँ अनचाहे
हो कर कभी अहम
तो कभी ईर्ष्या और विद्वेष
आ ठहरी थी हीनभावना
धरा था कुंठाओं ने वेश.....

जो होना था
अपना घर मेरा
बन गया ज्यूँ
हो कोई खुली सराय
होने थे जो मेहमान
कुछ दिन के
दिया वक़्त ने
उनको ही मालिक बनाय.....

उठाने को नखरे
मेहमानों के
उलझ गयी थी
उफ्फ मेरी तौबा
धीमी सी आवाज़ अपनी का
सुनने का
ना मिला था कोई मौका...

कर डाले थे
इक दिन  बन्द मैंने
घर के दरवाज़े और खिड़कियां
शांत गहन अंधकार में
पाई थी मैंने
स्वयं की नाना झलकियां......

कर सकूँ विदा
अनचाहे अतिथियों को
प्रयास यही अब मेरा है
अभीष्ट है मिलना स्वयं से
जब तक इस घर मेरा डेरा है.....