गुरुवार, 19 जुलाई 2012

समर्पण...

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समर्पण
होता है घटित
सहज ही ,
नहीं है यह
कोई क्रिया
किया जाता हो
सप्रयास
जिसे
द्वारा किसी
कर्ता के ....

किया जाता है
कभी त्याग
चढ़ा कर आवरण
समर्पण का
और
होती है चाहत
त्याग के
अभिज्ञान की

सप्रयास किया
अहंकार जनित
छद्म समर्पण
होता है कभी
दान स्वरुप
दानी होने का
दंभ लिए ...

समर्पण
है पिघलना
बिना किसी
प्रयास के,
नहीं है यह
निर्भरता
किसी अन्य पर ..
कितना सुन्दर है
समर्पण,
कितनी असुंदर
निर्भरता...

हैं ना
विचित्र बात
त्याग,
दान
और
अर्पण की...

किताब ज़िंदगी की ....

लिख दिए हैं
ज़िन्दगी ने,
सफ़े चाहे -अनचाहे
किताब में
मेरी तुम्हारी ,

पढ़ लिया है
डूब कर
मैंने तुझको
तूने मुझको
आगाज़ से
अंजाम तक,

ये बेजुबान
बेजान अलफ़ाज़
नहीं कह पा रहे
दास्तान
मेरी तुम्हारी ,

आओ ना !
चीर कर
उन सफ़ों को
समा जाएँ
जिल्द में
हम दोनों

हो जाएगी यूँ
मेरे हमनवा !
मुक्कमल
ये किताब
ज़िन्दगी की .....

सोमवार, 9 जुलाई 2012

तू दिया ..... मैं बाती ..!




अब कहाँ हम दूर ए साथी !
राह अपनी जगमगाती
प्रकाश है कृतित्व अपना
तू दिया ....मैं बाती ......!!

यूँ समेटा तू ने खुद में
घुल रहा अस्तित्व मेरा
जो हृदय में है प्रवाहित
सत्व तेरा और मेरा
आ भिगो दूं सीना तेरा
मेरे आंसू ,बनें थाती ......

काल कुछ ना कर पायेगा
हम शक्ति हैं एक दूजे की
तूफां सब सह लिए हैं साजन
दीप्त लौ अब ना बुझेगी
बस आलोक ही ध्येय है अपना
कृष्ण रजनी क्या रुक पाती .....!!

शनिवार, 30 जून 2012

बाकी न कोई चाहत ....



ठहरे थे यूँ पलक पे

मेरे अश्क वक़्त-ए-रुखसत

मिले छुअन तेरे लबों की

बस एक ही थी हसरत



हो रहे हो दूर मुझसे

या हुए खफा हो खुद से

नहीं फर्क इनमें कोई

दोनों की एक फितरत .....



वल्लाह ये इश्क अपना

नायाब इस जहां में

तारीख में क्या होगी

ऐसी मिसाल-ए-उलफ़त .....



तेरे होठ मुस्कुरा दें

मेरा रोम रोम हँस दे

है खुशी का ये सरमाया

होनी है इसमें बरकत ......



नहीं फ़िक्र दो जहां की

ना रस्मों से हम बंधे हैं

खुदी अपनी बेखुदी है

बाकी ना कोई चाहत ........

सहज स्वीकार करूँ मैं....

क्षुधा, पिपासा 
जीवन अंग 
चलते जाएँ 
पल पल संग 
क्यूँ प्रतिकार करूँ मैं !
सहज स्वीकार करूँ मैं ......

कभी पिपासा 
तन की जगती, 
होता कभी 
मन है प्यासा ,
भिन्न भिन्न 
आधारों पर 
धरती कई रूप 
पिपासा.. 
स्पष्ट दृष्टि 
अवलोकन करके 
वैसा ही व्यवहार करूँ मैं......

मन की ,तन की 
और जीवन की ,
हैं उत्कट 
पिपासायें ,
कर देतीं 
बरबाद कभी 
कभी जगातीं  
जिज्ञासाएं ,
नश्वर क्या है 
जान सकूं 
शाश्वत यह साकार करूँ मैं .....

कौन हूँ मैं 
और 
मैं हूँ क्यूँ !
जिज्ञासा है 
बहुत सहज ,
पा लूं उद्गम स्रोत 
मैं अपना 
प्यास निरंतर 
यही महज 
तोड़ सकूँ 
प्रस्तर चट्टानें 
यूँ सशक्त प्रहार करूँ मैं ...
क्षुधा पिपासा जीवन अंग
सहज स्वीकार करूँ मैं.......

सोमवार, 18 जून 2012

वान्छाएं .....



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तन अपनी कुव्वत आजमाए
मन को कोई बाँध ना पाए 
मन पगला उड़ उड़ कर पहुंचे 
लोक अजाने घूम के आये .....

तन जर्जर पर मन बच्चा है 
अंतर्मन बिलकुल सच्चा है 
पड़े आवरण झूठे इस पर 
खुद को भी यह जान ना पाए ...

अहम् ,द्वेष, स्वार्थ और लोभ 
मन में उत्पन्न करते  क्षोभ 
स्रोत से भटका ,समझ ना पाया 
ज्ञान किताबी केवल भरमाये ...
ऐन्द्रिक वान्छाएं जुडी हैं तन से 
भावों में परिवर्तित मन से 
वही भाव बन कर के सोच 
निज व्यवहार में उतर ही जाए....

वान्छओं को हम पहचानें 
न दें गहरी जड़ें जमाने 
मन को मुक्त करें यदि उनसे 
सहज स्वभाव सरल हो जाए ...

शनिवार, 16 जून 2012

दर्पण सौं नेह....



दर्पण सौं नेह कहाँ है सखी री !

रजनी हो मावस पूनम की
दिवस प्रहर हो  कोई भी
जब निरखूं तब पाऊं उर में
ऐसी प्रीती कौन निबाहे री...

देखे वो मुझको जस का तस
सिंगार करूँ या रहूँ सहज
मेरे गुन-अवगुन के बिम्बों को
दिखलाये मोहे निपक्ख री  .....

ना कोई बाधा अस्तित्व नाम की,
धर्म अर्थ और मोक्ष काम की,
देह विदेह भुला कर सब कुछ
अपनाये मोहे  निष्काम री...

छवि देख मैं मन ना डिगाऊँ
सच से ना कभी नज़र चुराऊं
निज को पाने का अर्थ मिले
मुझमें वो लगन जगाये री ....