सोमवार, 19 दिसंबर 2011

प्रेम,मित्रता और मैत्री ..

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प्रेम मात्र है बस एक सीढ़ी
मित्रता के द्वार तक
मित्रता भी है केवल पुल
मैत्री के विस्तार तक

बिना मित्रता प्रेम है नश्वर
अंत द्वेष में होता जिसका
ठगा हुआ महसूस सा करते
दोष ना जाने होता किसका

प्रेम ले जाता ऊपर जब भी
घटित मित्रता होने लगती
मित्रता भी उपर उठ कर
मैत्री में है खोने लगती

जड़ प्रेम है ,फूल मित्रता
मैत्री तो है शुद्ध सुगंध
प्रेम ,मित्रता में दो होते
मैत्री नहीं कोई सम्बन्ध

मैत्री है नभ सा विस्तार
होता घटित हृदय में अपने
नहीं है बंधन ,नहीं सीमाएं
सच होते से लगते सपने

5 टिप्‍पणियां:

देवेंद्र ने कहा…

सुंदर व भावात्मक प्रस्तुति।

कुमार संतोष ने कहा…

बहुत सुंदर.. उम्दा रचना हमेशा की तरह !

आभार...!!


मेरी नई रचना "तुम्हे भी याद सताती होगी"

Anita ने कहा…

प्रेम के बिरवे में मित्रता का फूल और मैत्री की खुशबू फैलाती आपकी सुंदर रचना दिल को छूती है... आभार!

vandan gupta ने कहा…

बहुत सुन्दर विश्लेषण किया ।

Kamal ने कहा…

Bahut hi khoobsurat ahsaas liye sajhati hume ye adbhut panktiya