बुधवार, 21 दिसंबर 2011

प्रबुद्ध या बुद्ध !

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अपने अंतर का
आडोलन,
हर क्षण मानो हो
आन्दोलन ,

रत हैं हम सब
लड़ने जैसे
अनवरत
एक अपरिभाषित युद्ध ,
कोई नहीं
प्रतिपक्षी उसमें
है बस वह
स्वयं का
स्वयं विरुद्ध ,

हो ज्ञात जिस पल
सत्य सार्थक ,
गति पाता
जीवन प्रवाह
रहता जो
अकारण
अवरुद्ध ,
कुंठा मुक्त
मानव
हो सकता
सहज साक्षात्
प्रबुद्ध
या
बुद्ध !


3 टिप्‍पणियां:

vandan gupta ने कहा…

गहन अभिव्यक्ति

नीरज गोस्वामी ने कहा…

वाह...कमाल की नज़्म कही है आपने...बधाई

नीरज

देवेंद्र ने कहा…

स्वयं को जानना ही तो प्रबुद्धता हैं। सुंदर कविता।