मंगलवार, 31 अगस्त 2010

चले आओ ,चले आओ......

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तुम्हें दिल ने पुकारा है
चले आओ ,चले आओ...
ना तरसाओ ,ना तड़पाओ.
चले आओ, चले आओ

हवा भी हो के निश्चल
सुन रही है ,टूटती सांसें
नज़र भी थक रही है
छोड़ ना बैठे कहीं आसें
है नाज़ुक दिल बहुत मेरा
जरा इस पर तरस खाओ
चले आओ ,चले आओ.....

खनक मेरी हंसी की
खो गयी जाने कहाँ जानां
रुके पलकों पे ,ना सीखा
यूँही अश्को ने बह जाना
हुई गुम मैं कहीं खुद में
मुझे तुम मुझसे मिलवाओ
चले आओ ,चले आओ......

ये मौसम ये हवाएं
छेड़ते हैं जब मेरी अलकें
तभी तुम चुपके आके
मूँद लेते हो मेरी पलकें
हकीक़त में बदल दो
ये तस्सवुर ,अब ना भरमाओ
चले आओ ,चले आओ......

रविवार, 29 अगस्त 2010

अच्छा लगता है....

कभी यादों के कूचे से गुज़रना ,अच्छा लगता है
गए लम्हों को फिर साँसों में भरना ,अच्छा लगता है

वो दुनिया से जुदा हो कर मेरे पहलू में आ जाना
तेरी दीवानगी महसूस करना ,अच्छा लगता है

किया करते थे हम कोशिश हसीं लम्हे चुराने की
चुराए वक्त में जीना औ' मरना ,अच्छा लगता है

तड़प दिल में वही है चाहे हम तुम मिल नहीं पाएं
खतों की मार्फ़त ,दूरी बिसरना,अच्छा लगता है

हज़ारों काम हैं तुमको ,बनिस्बत इसके भी जानम
तेरे ज़ेहन से हर लम्हा गुज़रना अच्छा लगता है

हकीक़त या तस्सवुर है ,मुझे कुछ होश ना इसका
सिमट कर तेरी बाँहों में बिखरना,अच्छा लगता है

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

बादल और सूरज का खेल...

#####

आज
प्रारंभ हुई
सुबह,
कुछ
अनोखी
बेजोड़ सी ..
सूरज
और
बादलों में
जैसे
लगी हुई थी
होड़ सी...

हो
रही थी
तीव्र
बारिश,
छाई थी
घटा
घनघोर ..
सूरज भी
आज
आमादा था
चमकने को
पुरजोर ...

सह रहा था
हफ्ते भर से
बादलों की
वह
मनमानी ......
लगता था,
आज,उनमें
ना छुपने की
मन में थी
उसने ठानी...

चमकदार धूप
और
मूसलाधार
बारिश का
ये अद्भुत
तारतम्य ...
चल रहा था
प्रकृति का
जैसे
रास-रंग
कोई रम्य ...

और बन गयी
मैं
दर्शक
इस
अनोखे खेल की ...
अद्भुत प्रतियोगिता
हो रही थी
बादल
और
सूरज
के मेल की ....

कभी लगता
नीर बादलों का
अब
चुक रहा है,
अगले ही पल
दिखता
सूरज
बादलों से
जैसे
रुक रहा है...

तभी
चमत्कृत
हो उठी
अकस्मात
मेरी आँखें,
झिलमिला उठी
हर तरफ़
जैसे
असंख्य
सतरंगी पांखें ...

गुज़र कर
बारिश की
हर बूँद के
अंगों में ...
रौशनी सूरज की
हो रही थी
परावर्तित
सप्त रंगों में ...

सजा रहा था
प्रकृति को
ईश्वर
ज्यूँ
निज हाथों से,
नभ से
धरा तक
सतरंगी
बल्बों को
जैसे,
टांग
दिया था
धागों से .....

समा कर
बूंदों में ,
रौशनी
सूर्य की
लगी थी
रिसने ..
गुज़र कर
उनसे
कर दिया था
हर ज़र्रा
सतरंगा
उसने ....

बिना
हार जीत
का यह खेल
जिसमें
खिल
उठा था
हर सूं
रंग
एकत्व का...
कर गया
अभिभूत
मुझको,
बरस रहा था
नूर इसमें
जैसे
ईश्वरीय
तत्व का...

बुधवार, 25 अगस्त 2010

झरते हैं भाव ,मेरे दिल से .....

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अपने इश्क में हमने जानम
खुद को ऐसा साधा है
झरते हैं भाव ,मेरे दिल से
लफ़्ज़ों में तूने बाँधा है ..

बातें जब किसी और से होती
अंत सभी हो जाती हैं
किन्तु बातें हम दोनों में
साँसों जैसी चल जाती हैं
एक खतम हो तो झट दूजी
आ जाती बिन बाधा है
झरते हैं भाव ,मेरे दिल से
लफ़्ज़ों में तूने बाँधा है ..

जब भी तेरी ओर निहारूँ
तू नहीं अकेला सा दिखता
नयनो में छवि दिखती मेरी
इक साये से ज्यूँ तू घिरता
कृष्ण हों जग में कहीं अवस्थित
रों रों से दिखती राधा है
झरते हैं भाव ,मेरे दिल से
लफ़्ज़ों में तूने बाँधा है ..

घटित हुआ है प्रेम हमारा
रस्म रिवाज़ों से हट कर
सदा साथ इक दूजे के हैं
नहीं किन्तु जग से कट कर
सम्पूर्ण किया इक दूजे को
ना हममें अब कोई आधा है
झरते हैं भाव ,मेरे दिल से
लफ़्ज़ों में तूने बाँधा है ..

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

दिशा ...(आशु रचना )

अन्धकार है
कितना गहरा
दृष्टि को
सूझे ना कुछ भी,
दिशाहीन सा
भटके राही
भेद कोई
बूझे ना कुछ भी........
दूजों के
अनुभव से चाहे
राह सही
मुझको मिल जाए,
अनजानी
मंज़िल की जानिब
डरते डरते
कदम बढ़ाये........
दिशा मिलेगी
सही तभी जब
खौफ़ न होगा
अनजाने का,
भटकन का डर
त्याग हृदय से
निश्चय
परम सच को
पाने का.........
अगला शब्द-भटकन

सोमवार, 23 अगस्त 2010

मनुहार --(आशु रचना )

######

रूठूँ कैसे तुमसे साजन
तुम ना करते मनुहार
प्रेम है फीका बिन इसके
ज्यूँ दाल हो बिना बघार .....

मानिनी बन के राह निहारूं
तुम खुद ही बढ़ आओगे
प्रेम पगी फिर बतियाँ करके
तुम मुझको बहलाओगे
किन्तु तुम को लगता हममें
इन सबकी क्या दरकार
प्रेम है फीका बिन इसके
ज्यूँ दाल हो बिना बघार .....

फूल भी खिलते तभी समय पर
सींचा उनको जब जाता
वरना नेह प्रतीक्षा में ही
पौधा कुम्हला जाता
खिज़ा नहीं है भले ही मुझ पर
पर तुम लाते हो बहार
प्रेम है फीका बिन इसके
ज्यूँ दाल हो बिना बघार .....

सच...(आशु रचना )

####

साबित करने
झूठ को
होते हैं
प्रपंच कई ...
इक्कठे कर
गवाह सबूत
गढ़ गढ़
कहानियां नयी...
किन्तु होता
नहीं आसां
साबित करना
सच को ,
वो तो
होता
सभी के लिए
एक
जो हो जाता
बस महसूस
लिए अपने
मौन को ...

रविवार, 22 अगस्त 2010

कसम...(आशु रचना )



कसम ना दो तुम
मुझको कोई
रस्मों को
ना थोपो मुझ पर
सहज हूँ मैं
दिल के रिश्तों में
यकीं तो करके
देखो मुझ पर.....

रस्मों कसमों में
यूँ बंध कर
रिश्ते कब तक
जिन्दा रहते
बंधन में ही
घुट जाते हैं
खुद से
बस शर्मिंदा रहते
स्नेह की
अमृत वर्षा में
भीगो खुद ,
बरसाओ मुझ पर......

खुद पर यकीं
ना होता जिनको
कसमें वो
औरों की खाते
बात का अपनी
वजन बढ़ाने
बाट वे
कसमों के लटकाते
सच को
जब तुम
समझ ना पाते
कसम
बोझ बन जाती मुझ पर......

क्रंदन--(आशु रचना )


#####

हृदय का मेरे
मूक क्रंदन ,
प्रेषित करता
जब स्पंदन ,
विचलित
तुम भी ,
हो उठते हो ,
कैसा अप्रतिम है ,
ये बंधन

बिना नाम के
ये रिश्ते यूँ
अदृश्य डोर से
हैं जुड़ जाते
बंधन बिन भी
बंधे हैं हम तुम
राह हर इक
संग संग
मुड़ जाते

कभी साथ
रहने वाले भी
हृदय मगर
छूने ना पाते
मूक भाष्य को
क्या समझे वो
उलझे अपने में
रह जाते ....

दूरी नजदीकी का कोई
अर्थ नहीं
रूह के
रिश्तों में ..
सूक्ष्म रूप में
जुड़ने वाले
जीवन ना जीते
किश्तों में ...

हर पल साथ है
सूक्ष्म रूप ये
हर कण में
बस ये ही समाया
उस विराट ने
जग वालों को
देखो तो
कैसे भरमाया ...!!!

बार-बार (आशु रचना )

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आती है सदा तेरी
बार -बार ...

पुकारती है रूह मेरी
बार बार ..

बढती हूँ जानिब तेरी
बार -बार ...

उलझती हैं बेडियाँ मेरी
बार -बार ..


तोड़ कर बंधन सारे
चली आउंगी पास तेरे
एक बार .......

शनिवार, 21 अगस्त 2010

भावों के इस कर्षण में

######

कमी कहाँ रह जाती साजन
मेरे सहज समर्पण में
बीज प्रेम का खो जाता है
भावों के इस कर्षण में ....

नारी मन की सहज भावना
कैसे समझाऊं तुम को
नहीं मुखर ये शब्द हैं मेरे
नैनो से बतलाऊं तुम को
अनबोली भाषा किन्तु ना
सुनी जाए इस घर्षण में
बीज प्रेम का खो जाता है
भावों के इस कर्षण में ....

हो जाता अवरुद्ध प्रवाह भी
हर शै बोझिल हो जाती है
नदी भी जैसे बाँध के कारण
मिथ्या स्थिर हो जाती है
नहीं सुहाता बिम्ब भी अपना
जब जब देखूं दर्पण में
बीज प्रेम का खो जाता है
भावों के इस कर्षण में ....

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

प्रीतम....

#####

प्रीतम के नैनो से छलके
अप्रतिम स्नेह की धार
भीगे तन मन उसमें मेरा
ज्यूँ सावन की प्रथम फुहार

निज को जान रही हूँ मैं भी
उनकी नज़रों से पढ़ कर
चंचल हूँ मैं हिरनी जैसी
लावण्य कुसुम से बढ़ कर
उपमाएं दे दे कर प्रिय ने
रूप दिया है निखार
भीगे तन मन उसमें मेरा
ज्यूँ सावन की प्रथम फुहार

तत्पर उनकी एक चाह पर
सर्वस्व करने को अर्पण
हृदय में बसते उनको मेरा
तन मन पूर्ण समर्पण
नहीं है कुछ भी मेरा जिसपे
उनका ना अधिकार
भीगे तन मन उसमें मेरा
ज्यूँ सावन की प्रथम फुहार

अस्तित्व समाया इक दूजे में
पृथक नहीं अब हम दो
उनमें मैं हूँ या मुझमें वो
गहन भेद है ये तो
मेरी आँखों से छलके है
हृदय का उनके प्यार
भीगे तन मन उसमें मेरा
ज्यूँ सावन की प्रथम फुहार .......

ग्रहण करो तुम भाव ये मेरे ....

####

प्रेम भक्ति से पूर्ण भोग है
अर्पण तुझको भगवन
ग्रहण करो तुम भाव ये मेरे
हो आनंदित मन तन

अहम् क्रोध विद्वेष को तज कर
हृदय करूँ मैं निर्मल
निर्लिप्त रहूँ मैं जग में रह कर
ज्यूँ पंकज कोई खिल कर
प्रेम तुम्हारा राह दिखाए
रौशन हो हर कण कण
ग्रहण करो तुम भाव ये मेरे
हो आनंदित मन तन .......

भक्ति मेरी निश्छल ईश्वर
नहीं पास कुछ मेरे
मन मंदिर में बसा के तुझको
पाँव पखारूँ तेरे
जो कुछ भोगा जग में मैंने
सर्वस्व तुझी को अर्पण
ग्रहण करो तुम भाव ये मेरे
हो आनंदित मन तन.....

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

जीवन का भेद....

#####

भेद बड़ा गहरा है यारों
सोचो समझो इसको जानो
जीवन में पाना क्या तुमको
अपने भीतर उसको ठानो

जो भी पाना है तुमको फिर
महसूस करो उसके आने का
हर पल अपने अंतर्मन में
विश्वास करो उसको पाने का

तुम्हारी सोचे यकीं तुम्हारा
फल देगा मनचाहा तुमको
जीवन में सब मिलता ही है
जो होता मिल जाना तुमको

जब भी संशय होगा मन में
मनचाहा ना मिल पायेगा
डरोगे जिससे , 'ना हो जाए '
काम वही फिर हो जायेगा

सोच दृढ कर अभीष्ट की अपने
जीवन को तुम जी लो यारों
जीवन में क्या पाना खोना
सब कुछ तुम पर निर्भर यारों .... ....



बुधवार, 18 अगस्त 2010

लिबास ...(आशु रचना )


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लिबास से
उसके
लगाया था
कयास
उसकी
शख्सियत का

कितनी
गाफिल थी ,
लिबास से
होता है
अंदाज़ा
फक़त
हैसियत का

वो भी तो
होता है
गुमाँ
ज़्यादातर
निगाहों का
ही
लेकिन

दिल पर
नहीं होता
असर
कभी,
ऐसी
किसी
कैफियत का ....

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

साकी ....

तूने जबसे सीख लिया है
मदहोश बनाना साकी को
कितने भी मयकश आये जाएँ
मुश्किल है लुभाना साकी को ....

भूली सब अपना बेगाना
याद नहीं अब खुद की भी
तेरे इश्क में डूब गयी है
पार ना जाना साकी को .....

तेरे क़दमों की आहट से
धडके दिल ,लरजे तन मन
बारिश में अब इश्क की तेरे
भीग ही जाना साकी को...

तूने तो तौबा की है अब
मय को हाथ लगाने की
पर चाहत का ये पैमाना
आता छलकाना साकी को ..

झुक जाती है सजदे में
खुदा बना उसका तू ही
कैसे समझे कैसे जाने
बेदर्द ज़माना साकी को....

बोझिल......(आशु रचना )


####

मिलन के
पलों को,
जुदाई की
सदियों से
जोड़ने वाला
क्षणों का पुल
अकेले
पार करते हुए
बोझिल
हो उठती हूँ
मैं ....
चलो ना!!
जुदाई की
सदियों तक
चले
हाथों में हाथ लिए
इस पुल पर
और
विदा के
इस क्षण को
संजो कर
गुज़ार दें
उन सदियों को,
पुल के
उस तरफ
घटित
मिलन के
पलों को
देख
अपने
साथ का
एहसास लिए ........

सोमवार, 16 अगस्त 2010

भाई...(आशु रचना )


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तुम मुझसे पहले आये थे
चले गए फिर मुझसे पहले
बड़ा भाई ना मिल पाने के
ज़ख़्म कभी मेरे ना सहले


जब भी कहती तुम होते गर
मैं कितनी खुशकिस्मत होती
माँ कहती थी ,तुम होते तो
मैं फिर इस घर में ना होती

बचपन यौवन सब बीता यूँ
नेह तुम्हारा मिल ना पाया
वंचित रही भाव से ,जो था
भ्रात सुरक्षा का हमसाया

तुमको ढूँढा मैंने उसमें
जरा भी मन जिससे जुड़ पाया
पर राखी बंधवा कर भी वो
बहन मान ना मुझको पाया

थोथे होते नाम के रिश्ते
भाव ना अंतर्मन से आते
भाई बहन का नाम लगा कर
अपमानित क्यूँ यूँ कर जाते

तुषार ...(आशु रचना )


#####

ज्यूँ सागर से
होता है
वाष्पित जल
पा कर
ऊष्मा
सूर्य की .....
यूँही
भाव हृदय के
हो कर
वाष्पित
प्रेम ऊष्मा से
छा जाते हैं
आँखों के आसमां
में
बदली की तरह ...
नहीं मिलता
बरसने को
जब
अनुकूल मौसम
इनको ,
तो ,
आँखों की ये नमी
बनके
तुषार
बिखर जाती है
रिश्ते पर
अपने ....
हूँ प्रतीक्षारत ..
इस सर्द मौसम में ,
धूप के लिए
पिघलाने को
ये तुषार
तेरी
बस एक
तप्त दृष्टि
बहुत है ......

मंज़िल का मेरी हो एहसास...

#####

चलते चलते
उजाड़ राहों पे
हो रहे थे
पाँव शिथिल
उखड़ रही थी
सांस...
बेतरह
सूख रहा था
गला
लगी थी कैसी
प्यास...
नहीं था कोई
आसार पानी का
दिखती ना थी
छाँव की भी
आस...
अचानक
मिल जाना
तुम्हारा,
भर गया
मुझमें
कैसा
विश्वास....
बढ़ चली
उत्साहित
हो मैं,
भूली
कंठ सोखती
प्यास...
चले हैं
हम
साथ यूँ जैसे
जुडी है
एक दूजे से
अपनी
साँस...
छाँव भी
तुम हो
जल भी
तुम ही,
तुम ही
मंजिल का मेरी
हो
एहसास.......

सन्नाटे.....(आशु रचना )...


####

समेट कर
एहसास सारे
दिल से
अपने,
भर लिए थे
मैंने
निगाहों में
अपनी ...
छलकती नज़रों की
ज़ुबान पढ़ने में
थे शायद
नाकाबिल
तुम,
कर एहसास
इसका
दिए थे लफ्ज़
उन एहसासों को
गुज़रे थे
जो लबों से
मेरे ....
गूँज रहे हैं
वो लफ्ज़
मेरे दिल के
सन्नाटे में
शोर
बन कर,
जो
लौट आये हैं
टकरा कर
तुम्हारे
कानो के
बंद
दरवाजों से .....
चलो !!
कम से कम
दिल के
सन्नाटे में
कोई
चहल -पहल
तो है ......




रविवार, 15 अगस्त 2010

मोहब्बत और आजादी ...

###

डरता है वो
कि
हो ना जाए
वो
किसी की
मोहब्बत में
गिरफ्तार ....
हैरान होता है
कि
कैसे कर पाती हूँ
मैं
किसी से
इतना प्यार

नादाँ है
नहीं जानता
जिंदगी के
इस छोटे से
राज़ को ,
मोहब्बत
नहीं करती
गिरफ्तार
कभी किसी
परवाज़ को

रहती है
जब तक
आज़ादी
और
मोहब्बत
जुदा ,
नहीं होता
महबूब
किसी के लिए
तब तक
खुदा ...

लगायी
नहीं कोई
पाबन्दी
खुदा ने खुद
अपनी
परस्तिश में,
उलझता है
इंसान
फिर क्यूँ
इश्क की
बेजा
आजमाईश में...

जब तक होंगे
आज़ादी
और
मोहब्बत
दो अलहदा
एहसास ,
घुटती रहेगी
यूँही
जिंदगी की
हर
आती -जाती
सांस...

डूब जाना
मोहब्बत में
नहीं है
गिरफ्तारी
इश्क की ,
है ये आज़ादी
फ़ैल जाती जो
ज़र्रे ज़र्रे में
जैसे महक
मुश्क की .....

शनिवार, 14 अगस्त 2010

स्वाति नक्षत्र ...

###

मैं हूँ
वो सीप
कि
पाने की
जिसको
बूँद के
जल्दी
नहीं
होती ....
करती
प्रतीक्षा
स्वाति नक्षत्र
की
बने बूँद
जब
सच्चा
मोती.....

खौफ नहीं रहजन का ..दौलत को मेरी

#####

स्व-ज्ञान की
नन्ही गठरी
चली थी
संभाले
अनजान
राहों पर ....
किया इजाफ़ा
रहबरों ने उसमें
अपनी
दौलत से
जो कमाई थी
उन्होंने
चलते हुए
इन्ही राहों पर
मुझसे पहले ...
बढ़ता गया
सरमाया मेरा
काबिल हुयी
दे पाने में
मैं भी
निरंतर बढ़ती
दौलत को...
खोली है गाँठ
जबसे
गठरी की
मैंने,
होती जाती हूँ
और भी अमीर
और
शादमां मैं
क्यूंकि
नहीं हूँ
खौफ़जदा
किसी
रहजन
के होने से ......

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

प्रिये ...(आशु रचना )


######

तुम सात समुन्दर पार प्रिये
मैं विरहन तुमको याद करूँ
इक खबर कोई पहुंचा आओ
हर शै से ये फ़रियाद करूँ

ये मेघ तो नहीं बंधे हैं यूँ
जैसे मैं सीमाओं से बंधती
गर पवन के जैसे होती मैं
छू छू कर तुमको मैं गंधती
ये सब तुमसे मिल आते हैं
मैं कैसे दिल आबाद करूँ
इक खबर कोई पहुंचा आओ
हर शै से ये फ़रियाद करूँ

तुम भी तो छुप छुप कर मुझको
खत लिखते हो खत पढते हो
कभी ख़्वाब में मुझको पाते हो
कभी कविताओं में गढते हो
ये प्यार ना कोई बंधन है
जिससे मैं तुम्हें आज़ाद करूँ
इक खबर कोई पहुंचा आओ
हर शै से ये फ़रियाद करूँ
तुम सात समुन्दर पार प्रिये
मैं विरहन तुमको याद करूँ ...




समर्थन -(आशु रचना)


####

ताक पर
रख कर
सोचों को
अपने...
करते जाना
समर्थन
प्रिय की
बात का ,
नहीं है
प्रेम सहज
अपितु
बन जाता है
कारन
अंतर्घात का ...

प्रेम नहीं
इक जैसा
होना ,
प्रेम तो है
बस
सच्चा
होना ..
हो
स्वीकार
अस्तित्व
प्रिय का,
किन्तु  
निज का
अस्तित्व
न खोना

अंतर
सोचों में
होता जब
विकसित
दोनों ही
होते हैं
खुले हृदय से
जाने समझे
नहीं
दूसरे को
ढोते हैं...

नहीं
विसंगति
प्रेम की
दुश्मन
गर मन
से सम्मान
करो तो ..
"तुम -मैं"
"मैं -तुम'
भेद छोड़ के
'हम" को ही
स्वीकार
करो तो ......

तुम भाल का मेरे चन्दन हो.....

######
मैं चरणों की हूँ धूल तेरे
तुम भाल का मेरे चन्दन हो
रों रों गुंजारित है जिससे
मुझमें बसते स्पंदन हो

कुछ और ना जाना जब से तुम
महके मेरे इस जीवन में
मेरे होठों की हर हंसी हो तुम
हृदय का हर इक क्रंदन हो
मैं चरणों की हूँ धूल तेरे
तुम भाल का मेरे चन्दन हो .....

पलक पांवड़े बिछा के मैं
करूँ प्रतीक्षा पल पल यूँ
तुम कहो,क्या तुमको लगता है ?
ये प्रेम मेरा एक बंधन हो !!
मैं चरणों की हूँ धूल तेरे
तुम भाल का मेरे चन्दन हो

बेपरवाह खुद को दिखलाते
पर साथ सदा रहते प्रतिपल
दुर्गम राहों पे चलने का
एकमात्र तुम्ही अवलंबन हो
मैं चरणों की हूँ धूल तेरे
तुम भाल का मेरे चन्दन हो

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

घूंघट..(आशु रचना )

####

वधु संभाले,रूप की गागर
छलकत जाए घूंघट से..
सलज हंसी की खनक कहो
कैसे रुक पाए घूंघट से ....

उमंग तो मन की छल छल छलके
रोम रोम से बन्नी के
नज़रें बोझिल .कम्पित हैं लब
झाँक रहे जो घूंघट से.....

हाथों का कंगना भी खन खन
बज उठता हर धडकन पर
नथनी डोल रही साँसों पर
चमक दिखाती घूंघट से ....

स्वपन अनगिनत हृदय संजोये
मंथर गति से आन रही
प्रियतम द्वार खड़े हैं आ कर
उन्हें निहारे घूंघट से ........

अँधेरा ...(आशु रचना )


####

एहसासों की कब्र बनी थी
मन में छाया घोर अँधेरा
दफ़न भले ही पर जिन्दा थे
मान्यताओं का लगा था पहरा

तेरे नूर की बारिश से फिर
बह गयी मिटटी उघड़ी परतें..
चीर के घोर अँधेरे को फिर
रौशन हुई अनजान हसरतें

सोचा समझा जाना निज को
भेद गहन फिर खुल के आया
उनकी मौत से पहले ही क्यूँ
एहसासों को यूँ दफनाया

ऐसा जीवन क्या जीवन है!!
जिसमें जीवित दफ़न हो कोई
आँख खुली और निद्रा टूटी
अब तक बेसुध क्यूँ थी सोयी!!

जीवन के चलते ही दीपक
जला लूं अंतर्मन का अपने
जिन्दा एहसासों को जी कर
जी लूं अपने सारे सपने .......



बुधवार, 11 अगस्त 2010

महसूस....


###
हो जाते हैं
महसूस
नेह के नाते,
स्पंदन नहीं
होते
मोहताज
दूरियों के
कभी ...
न हो
फितरत
गर
महसूस
करने की
दिल से ,
रह जाते
अजनबी
एक छत के
नीचे भी
सभी.....

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

प्यास.....

###

तेरी
निगाहों का
ये,
मदमाता
एहसास है
हुई
मदहोश
जिसमें,
मेरी
हर इक
सांस है..
मानिंद
शोलों की ,
भड़कते हुए
जज़्बात मेरे
आसां
नहीं
बुझाना,
जानां !!
ये ,
रूह की
प्यास है ...
---------------------------------

और उसने कुछ यूँ कहा :
##########

प्यास प्यास
होती है
जानां..
रूह की भी
जिस्म की भी...

प्यास में
जुड़ती है
जब आस
और
हो जाते
महसूस
एक दूजे के
एहसास,
प्यास
खुद बा खुद
बन जाती है
सांस...

रज़ा.....

####
शुक्रगुजार हूँ ,
मिला
है
जो भी
मुझको
उसमें
रज़ा है
तेरी ...
चाहा मैंने
पर
मिला नहीं
जो कुछ
उसमें भी
है शामिल
मर्ज़ी तेरी...
क्या शिकायत
तुझसे ए खुदा !!
बेहतर
तुझसे
कौन
जानता है
काबिलियत को
मेरी.....!!!

रविवार, 8 अगस्त 2010

आसमां...(आशु रचना )

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आसमां , ये मन का मेरे
विस्तृत नील गगन के जैसा
अरमानों के छाते बादल
चित्र बनाते कैसा कैसा ...

कभी श्वेत रुई से बादल
बिल्ली जैसे बन के दिखते
कभी सलेटी स्याही बन कर
नभ में कुछ आखर से लिखते
पढूं वो आखर ,समझ न पाऊं
ज्ञान मिला मुझको न ऐसा
अरमानों के छाते बादल
चित्र बनाते कैसा कैसा ....

कभी सूर्य को ढक कर बादल
दे जाते ठंडक सी मन को
कभी शीत में उसी वजह से
ठिठुरा जाते ,कोमल तन को
हर मौसम में रंग बदलते
रूप नहीं कोई इक जैसा
अरमानों के छाते बादल
चित्र बनाते कैसा कैसा ....

मंत्रमुग्ध कर जाते मुझको
आशा की किरने बिखरा कर
चित्रकार की कूची ने ज्यूँ
ढेरों रंग दिए छितरा कर
अलग अलग रंग जब जब देखूं
मन भी रंग जाता है वैसा
अरमानों के छाते बादल
चित्र बनाते कैसा कैसा ....

शनिवार, 7 अगस्त 2010

ख़्वाब ...(आशु रचना )


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सजा
लिए हैं
कांच से भी
नाज़ुक
ख़्वाब
पलकों पे
मैंने
अपनी ....
तपिश
लबों की
तुम्हारे
करती है
पुख्ता इनको...
हो जाते हैं
ये पारदर्शी
और
बेहद सुन्दर
जैसे
निखर
आता है
कांच
तपन को
सह कर ....
जागती
आँखों के
ये ख़्वाब
नींद भी तो
आने नहीं देते
इन
आँखों में
अब
ख़्वाब
बदलें
हकीक़त में
तो
शायद
सो पाऊं
सुकूँ से
मैं भी .....


शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

अहम् ....

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अहम् तुष्ट करने को मानव
क्या क्या ढोंग रचाता है
धोखा देता 'स्वयं' को पहले
फिर जग को भरमाता है

झूठे चेहरे लगा लगा कर
बिना बात मुस्काता है
हीन भावना से बचने को
उपद्रव ढेर मचाता है

ढूंढ के कमियाँ दूजों में वह
गुण अपने गिनवाता है
मूर्ख बड़ा ये भी ना जाने
सत्य कहाँ छुप पाता है

चाह रहे ये , पाए प्रशंसा
खेल यूँ खूब रचाता है
दिखा के नीचा औरों को पर
खुद नीचा बन जाता है

ठेस जरा सी सह नहीं पाए
अहम् तुरंत उकसाता है
राई बराबर बात हो कोई
पर्वत वो बनवाता है

'स्वयं' जागृत हो जाता जब
'अहम्' टूटता जाता है
कोमल नम्र उदार "स्वयं' से
'अहम्' हारता जाता है.......

बुधवार, 4 अगस्त 2010

पैमाना ..लम्हों का...


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पैमाना
मेरे लम्हों का
भर देते हो 
तुम
खिलखिलाहटों से ,
उदासी का 
देख कर
उनमें
एक कतरा भी ....

छलकते जाम सी
छलकती हैं
खिलखिलाहटें ..
हो जाता है
समां हसीन
और
पुरनूर 
मेरे आस पास भी....

लम्हों में
भरती
उदासी को
बदल सके जो
मुस्कुराहटों में,
सिवा तुम्हारे
नहीं ऐसा
यहाँ कोई भी .....

भरता
जा रहा है
आज ,
पैमाना
मेरे लम्हों का ,
उदासी से,
जानती हूँ
एहसास है ये
तुमको भी .....

चले  आओ.. !!
भरने को
इस थोड़े से
खाली बचे
प्याले में
खिलखिलाहटें  ...
कहीं छलक उठी
उदासियाँ
तो डूब जायेगी
उस सैलाब में
कायनात भी.......

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

मेरा अस्तित्व ..!!!


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कहते ही मेरे
कि
होना चाहती हूँ मैं
"स्वयं" में ..
बिना किसी के
साथ के ..
उतर आये थे
प्रश्नचिन्ह
ढेरों
नज़रों में
तुम्हारी
और
गुजर कर
नज़रों से
बिखर गए थे
तुम्हारे
चेहरे पर

छुप गयी थी
पहचान
तुम्हारी
उन प्रश्नचिन्हों के पीछे..
असंख्य
प्रश्नचिन्हों के मध्य
बन गया था
अस्तित्व तुम्हारा
जैसे स्वयं एक प्रश्न ...
"क्या मेरे भी बिना ???"

क्यूँ
स्वीकार नहीं लेते
कि मैं हूँ
एक अस्तित्व
"स्वतंत्र"
तुम्हारे बिना भी ..

हैं हम साथ
क्यूंकि
किया था
कुछ अपनों ने
निर्धारित,

जीते हैं
साथ
ये जीवन
करते हुए
कर्तव्य पूरे
अपने
जो अपेक्षित हैं
उन्ही अपनों के द्वारा,
बिना जाने बूझे
एक दूसरे के
अस्तित्व को ....

स्वयं को जाने बिना
कैसे जान सकती हूँ
मैं तुम्हें
या
तुम मुझे !!!
खोजने को
स्वयं की पहचान
नहीं चाहिए
बंधन
समाज द्वारा
निर्धारित किये
मानकों का
ना ही चाहिए लाठी
ओढ़े हुए रिश्तों की ...

बाहरी व्यवस्थाओं से
निर्बाध हो
जीना चाहती हूँ
सिर्फ और सिर्फ मैं
अपने अंतरंग में
कुछ लम्हे
एक नारी हो कर ....

दिया -लिया है
कई सालों
हमने
एक दूजे को
बहुत कुछ
किन्तु !!
पहचानने को
स्वयं का अस्तित्व
चाहिए एक
खुला आकाश
और
एक
विस्तृत सोच
जो देना चाहती हूँ
तुम्हें और
मांगती भी हूँ
तुमसे
बस यही..
बस यही...!!!!

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सोमवार, 2 अगस्त 2010

मौसम का क़हर भी ...


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आ आ के लौटी है ,साहिल से लहर भी
आ जाएगा महबूब तेरा,दो पल तो ठहर भी

इक लम्हा भी मिल जाए सुकूँ ,इस उम्मीद पे
जी लूं ग़म-ए-दौरां के कुछ और पहर भी

कुछ खौफ़ नहीं इनको तारीकी-ए -शब से
देखी है इन आँखों ने क़यामत की सहर भी

इक तो यूँही कटती नहीं हिज्र की रातें
उस पे है क़यामत हसीं मौसम का क़हर भी

रुकना नहीं फितरत मेरी, हूँ बहता हुआ दरिया
बांधों ना किनारों को ,बनाओ ना नहर भी

लफ़्ज़ों में उतर आते हैं जज़्बात मेरे जब
क्या फ़िक्र ,ग़ज़ल में अगर , ना हो बहर भी

क्या अपना क्या पराया....

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जग ने दी थी
परिभाषाएं,
अपना कौन ,
है कौन पराया !
स्पर्श किया
हृदय ने
सत्व को
बाकी सब
बिसराया ....

इस जग की
हर शै में
कोई अपना
बैठा होता,
मन की
गहरी परतों में
कोई सपना
पैठा होता
वही तो सपना
बस है अपना
बाकी झूठ ही पाया....

मेघ ,दामिनी
पवन औ' पावस
हृदय से
सब जुड़ जाते,
खुशबू बसती
अंतर्मन में
फूल भले ही
झड़ जाते
वही तत्व
मन के कोने का
अपनापन कहलाया.....


भेद पराये अपने का
जाना जबसे
ये गहरा,
हुई मुक्त
निज पूर्वाग्रहों से
टूटा मन का
हर पहरा
स्वयं से  भी मैं
रही परायी
भेद
नज़र अब आया........

रविवार, 1 अगस्त 2010

अपनापन...(आशु रचना )


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अपनापन होता है मन में
मन से ही पहचाना जाता
शब्दों के मीठे जालों में
हृदय कभी ना धोखा खाता

नहीं आश्रित रिश्तों पर यह
नहीं नाम की इसको परवाह
हृदय मिले जिनके आपस में
दुनिया से फिर क्यूँ हो चर्चा

मूक पशु भी समझते इसको
नेह स्पर्श सब जतला देता
मन से मन जुड़ जाते हैं जब
हृदय स्पंदन बतला देता

मत बांटो सीमाओं में तुम
अपनापन है इतना विस्तृत
दोगे जितना,कई गुना तुम
पा कर,हो जाओगे विस्मित॥