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सजा
लिए हैं
कांच से भी
नाज़ुक
ख़्वाब
पलकों पे
मैंने
अपनी ....
तपिश
लबों की
तुम्हारे
करती है
पुख्ता इनको...
हो जाते हैं
ये पारदर्शी
और
बेहद सुन्दर
जैसे
निखर
आता है
कांच
तपन को
सह कर ....
जागती
आँखों के
ये ख़्वाब
नींद भी तो
आने नहीं देते
इन
आँखों में
अब
ख़्वाब
बदलें
हकीक़त में
तो
शायद
सो पाऊं
सुकूँ से
मैं भी .....
सजा
लिए हैं
कांच से भी
नाज़ुक
ख़्वाब
पलकों पे
मैंने
अपनी ....
तपिश
लबों की
तुम्हारे
करती है
पुख्ता इनको...
हो जाते हैं
ये पारदर्शी
और
बेहद सुन्दर
जैसे
निखर
आता है
कांच
तपन को
सह कर ....
जागती
आँखों के
ये ख़्वाब
नींद भी तो
आने नहीं देते
इन
आँखों में
अब
ख़्वाब
बदलें
हकीक़त में
तो
शायद
सो पाऊं
सुकूँ से
मैं भी .....