सोमवार, 23 अगस्त 2010

मनुहार --(आशु रचना )

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रूठूँ कैसे तुमसे साजन
तुम ना करते मनुहार
प्रेम है फीका बिन इसके
ज्यूँ दाल हो बिना बघार .....

मानिनी बन के राह निहारूं
तुम खुद ही बढ़ आओगे
प्रेम पगी फिर बतियाँ करके
तुम मुझको बहलाओगे
किन्तु तुम को लगता हममें
इन सबकी क्या दरकार
प्रेम है फीका बिन इसके
ज्यूँ दाल हो बिना बघार .....

फूल भी खिलते तभी समय पर
सींचा उनको जब जाता
वरना नेह प्रतीक्षा में ही
पौधा कुम्हला जाता
खिज़ा नहीं है भले ही मुझ पर
पर तुम लाते हो बहार
प्रेम है फीका बिन इसके
ज्यूँ दाल हो बिना बघार .....

2 टिप्‍पणियां:

Deepak Shukla ने कहा…

Hi..

Unka man se tujhse pyaar...
Nahin dikhava hai darkaar...
Rooth ke dekho to ek baar...
Shayad wo kar len manuhaar...

Bahut hi sundar bhav...

Wah...Wah...

Deepak...

अनाम ने कहा…

kya baat hai..
bahut hi behtareen rachna....
yun hi likhte rahein...