शनिवार, 29 मई 2010

तेरी हस्ती का ख़ुमार

करती हैं ,हिज्र की रातें,तप तप के बेक़रार
सुकूँ दे जाते हैं ,दिल को, तसव्वुर के आबशार

कभी होते हैं हम साथ ,वादी-ए -कश्मीर में
गुज़रती हैं चांदनी रातें कभी ,रेगिस्तान-ए-थार

बहक जाती हूँ ,महक पा के तेरी साँसों की
खयालों में ,यूँ समां हो जाता है गुलज़ार

साथ तेरा,भले न हासिल हो , मुझे हकीक़त में
हर लम्हा ,मेरे ख़्वाबों  में, तू है रहता  शुमार

होश खो बैठे है , देखा जो तुझे एक नज़र
बाअसर है सनम ,मुझपे ,तेरी हस्ती का ख़ुमार

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6 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

अपनी अनुभूतियों की आकर्षक अभिव्यक्ति।

Deepak Shukla ने कहा…

Hi..

Jis se etna tujhko pyaar..
Ye teri hai jaan nisaar..
Tere bin ek pal bhi jeena..
Uska bhi hoga dushwar..

Sundar gazal..

DEEPAK..

अनाम ने कहा…

achhi aur umdaah rachna...
aur haan mere blog par...
तुम आओ तो चिराग रौशन हों.......
regards
http://i555.blogspot.com/

सूफ़ी आशीष/ ਸੂਫ਼ੀ ਆਸ਼ੀਸ਼ ने कहा…

Behad khoobsoorat!
Daad hazir hai, kubool farmayein!

rashmi ravija ने कहा…

गहरे भाव लिए सुन्दर रचना

Avinash Chandra ने कहा…

har ek sher khubsurat...itni der se aaya...maaf karein is baar :)