गुरुवार, 27 मई 2010

चौदहवीं का चाँद


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'कल चौदहवीं की रात थी "
दिखा होगा न
चाँद तो
शहर में
तुम्हारे भी..

यही गज़ल
गुनगुनाते थे
तुम
भर कर
मेरा चेहरा
अपनी
हथेलियों में
'हम हंस दिए
हम चुप रहे
मंज़ूर था
पर्दा तेरा '

और मैं
इठला के
पूछ बैठी थी
चौदहवीं का
ही क्यूँ
पूनम का
क्यूँ नहीं..
और
कहा था
तुमने
झील सी
आँखों की
गहराईयों में
डुबो के
मुझको..
हो तुम
चौदहवीं का
चाँद
क्यूंकि
पूनम का
चाँद
तो ढलना
कर देता है
शुरू
अगले ही
दिन से
जबकि
चौदहवीं का चाँद
होता है
हमेशा
विकसित
पूर्णता को
उपलब्ध
होने के लिए

6 टिप्‍पणियां:

Deepak Shukla ने कहा…

Hi..

Unko dekha jab kabhi..
wo chaudvin ka chand thi..
Jindgi ki dhup main bhi..
wo mahakti si lagin..

Dekh kar ke Chand ko,
usne bhi puchha tha yahi..
Kal Chaudvin ki raat main..
Chanda ko dekha tumne bhi?

Humne tha unko bataya..
dekhte na chand ko..
Dooj ka ho chand ya fir,
chaudvin ka chand ho..

Aasma ka chand bhi..
humko to feeka hai laga..
Chand se bhi khoobsurat..
Chand dil main jo basa..

DEEPAK..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

पूर्णता का एहसास करती हुई सुन्दर अभिव्यक्ति

अनाम ने कहा…

bahut hi sundar abhiwyakti...
achhi rachna ke liye badhai...

अनाम ने कहा…

aur haan mere blog par...
तुम आओ तो चिराग रौशन हों.......
regards
http://i555.blogspot.com/

Avinash Chandra ने कहा…

khubsurat...as usual...behad khubsoorat

Vinesh ने कहा…

हाँ पूर्णता के पश्चात कभी कभी क्षरण आरम्भ होता है..

बहुत सुन्दर कृति, पढ़ना अच्छा लगा.