गुरुवार, 13 मई 2010

चरैवेति ! चरैवेति ! चरैवेति !........


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चलना छोड़ा
व्यर्थ ही दौड़ा
निकलूं आगे
इस होड़ में
रह न जाऊं दोयम
भुला कर स्वयं
फंस गया कैसी
जोड़ तोड़ में .....

दौड दौड कर
दम भी फूला
लक्ष्य है क्या
तू यह भी भूला
चलना था जिन्हें
ले कर साथ
गिरा उन्हें ,बढ़ा,
छोड़ के हाथ.....

स्वार्थ छोड़ कर
आगे बढ़ना
तब जानेगा
दिल को पढना
चलना मानुष
की पहचान
इसी राह
मिलता भगवान.....

हर पल खुद को
देख के चलना
संधान स्वयं का
करते चलना
मिलता नहीं है
बारम्बार
दुर्लभ ये
मानव अवतार.....

बिना रुके बस
चलते जाना
जो पाया वह
देते जाना
राह अँधेरी
जोत जलाना
मन के तम से
ना भरमाना
गीत यही
बस गाते जाना......


"नदिया चले चले रे धारा
चंदा चले चले रे तारा
तुझको चलना होगा
तुझको चलना होगा " ........

3 टिप्‍पणियां:

nilesh mathur ने कहा…

बहुत सुन्दर !

अरुणेश मिश्र ने कहा…

प्रशंसनीय रचना ।

Deepak Shukla ने कहा…

Hi..

Jeevan path par pathik tujhe to..
Aage badhte jaana hai..
Prabhu ne tujhko diya hai jo kuchh..
Duniya ko lautana hai..

Duje ke sukh main sukh tujhko..
Swasth ko taj ke paana hai..
Sam ya visham ho chahe jitna..
Hanskar sada nibhana hai..

Aage badhte jaana hai..

Sundar kavita..

DEEPAK..