सोमवार, 17 मई 2010

मरहम...

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इच्छा ना
हो गर
स्वयम के
ज़ख्मों को
भरने की॥
व्यर्थ हैं
कोशिशें
बाहरी
संवेदनाओं के
मरहम की
सभी...
हो ना मन
अनुकूल ,
ग्राह्य ,
मरहम के
प्रति
अगर ,
बना
देती है
ज़ख़्म को
नासूर
विपरीत
प्रतिक्रिया
भी कभी .....


5 टिप्‍पणियां:

Deepak Shukla ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
Deepak Shukla ने कहा…

Hi..

Dil main khushiyan gar dhoondhenge..
Wohin kahin mil jayengi..
Dil ke jakhmon ki wo marham..
Wohi swatah ban jayengi..

Marham dil ka dil ke bheetar..
Bahar na wo mile kahin..
Man ki khushiyon main hi rahta..
Man ke bheetar jo rahe basin..

DEEPAK..

अनाम ने कहा…

bahut hi achhi rachna...
bahut hi khubsurat shabd bhi.....

संजय भास्‍कर ने कहा…

सुन्दर भावों को बखूबी शब्द जिस खूबसूरती से तराशा है। काबिले तारीफ है।

संजय भास्‍कर ने कहा…

Maaf kijiyga kai dino busy hone ke kaaran blog par nahi aa skaa