बुधवार, 26 मई 2010

टूटी कली...

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तोड़ कर
कली को
खिलने से
पहले
सजा लिया
गुलदस्ते
में
बैठक की
अपने ...
प्रतीक्षारत
थी  कली
फूल
बनने के
उसने
देखे थे
सपने ...
नहीं मिला
प्राकृतिक
अनुकूलन
अंतस के
सत् को
पहचानने
के लिए ..
जो होता
प्रसारित
जहाँ में
बन कर
महक,
करता
कितने
हृदयों को
आनंदित
पल्लवित
पुष्प 
पवन की 
छुअन से
जब जब
जाता लहक 

2 टिप्‍पणियां:

Deepak Shukla ने कहा…

Hi..

Dard kali ka samjha humne..
Jaisa tumne batlaya..
Ashsu bhale na chhalke mere..
Hruday mera hai bhar aaya..

Agar kali na todi hoti..pusp mahakte us upvan main..
Sans suwasit mahak se hoti..
Khilkar khilta sabke man main..

Sundar bhav..

Deepak..

अनाम ने कहा…

बेमिशाल पहले बोल दिया अब इसको क्या कहूँ? आपकी सोच और कलम को नमन