गुरुवार, 25 मार्च 2010

उसे कैसे जग से छुपाऊँ मैं .....

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मेरी हर
नफ़स में
छुपा है जो
उसे कैसे
जग से
छुपाऊँ मैं ...
बना खुद को
अब मैं
यूँ आईना,
अक्स
सब को
उसका
दिखाऊं मैं

देती
धडकनें भी
जो ताल हैं,
वो उसी की
धुन का
कमाल है..
सुरों को भी
जो साधूँ तो
हमनशीं
गीत बस
उसी का तो
गाऊं मैं..
उसे कैसे
जग से
छुपाऊँ मैं .....

लबों पर
जो खिली,
उस हंसी
में वो...
झुकी
पलकों की
हर इक
नमी में वो...
जुबां
बंद भी
रखूं तो ,
जिस्म के
रों रों को
चुप ना
कर पाऊं मैं...
उसे कैसे
जग से
छुपाऊँ मैं .....

2 टिप्‍पणियां:

Randhir Singh Suman ने कहा…

nice

Deepak Shukla ने कहा…

Hi..
Sundar bhav hain Kavita ke..
Shabd tere us se sundar..
Har ek shabd main ho jaise..
Bhavon ka ho ek samundar..

Jo kuchh bhi tum likhte ho..
Wo sab man ko bhata hai..
Pathak aur kavi ka rishta..
Har pal bandhta jata hai..

DEEPAK..