बुधवार, 17 मार्च 2010

स्वप्न -अवचेतन की चेतना


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फूल खिला इक रोज़ स्वप्न में
महक उठी उससे ज़िन्दगानी
सोच,भरम होता है सपना
क्यूँ थी मैं उससे अनजानी

लेकिन सपनो के साए ही
जीवन में प्रतिबिंबित होते
जी लेते हैं हर उस पल को
जो जगते प्रतिबंधित होते

जागी आँखों के सपने ही
जीने का एहसास कराते
पूरा होगा मन का सोचा
दिल में ये विश्वास जगाते

मूँद के पलकें खो जाओ तुम
अवचेतन की चेतना में
उर आनंद समा जाएगा
ना भटकोगे वेदना में

2 टिप्‍पणियां:

Randhir Singh Suman ने कहा…

nice

Deepak Shukla ने कहा…

Hi..
"JEE LETE HAIN HAR US PAL KO..
JO 'JAGTE PRATIBANDHIT' HOTE"..
Wah kya baat hai..

Jagti ankhon ke sapne hi,
aksar sabke pure hote..
Jagte bhi pratibandhit hon jo..
Sapne sabhi adhure hote..

Sapne jo sokar ke dekhe..
Sapne wo sab soye rahte..
Ek pal khushi wo de den chahe..
Par jagte sab khoye rahte..

Sundar kavita chunkar rachaye shabdon ke sath..

DEEPAK SHUKLA..