सोमवार, 1 मार्च 2010

कान्हा ...खेरो होरी !!!

रंग उड़े हैं नीले पीले
कोई मन ना भाये
कान्हा तेरी प्रीत निगोड़ी
तन भी रंग रंग जाए

मन मेरा अब हुआ बसन्ती
तन पर उसकी छाया
रंग हुआ गालों का ऐसा
ज्यूँ गुलाल छितराया
देख छवि कान्हा में अपनी
नैनन रंग बरसाए
कान्हा तेरी प्रीत निगोड़ी...

होली का हर रंग है फीका
क्या नीला क्या पीला
सूखा मोरा मन है तुझ बिन
रंग डार करो गीला...
लगूं अंग अब स्याम तिहारे
मन तन सब रंग जाए
कान्हा तेरी प्रीत निगोड़ी...

खिला है फागुन चहुँ दिसा में
सुनो वेदना मोरी
सखियाँ रंगने आयीं लेकिन
चुनरी मेरी कोरी
रंग दो मेरे रोम रोम को
मैं तू,तू मैं हो जाए
कान्हा तेरी प्रीत निगोड़ी
तन भी रंग रंग जाए ..

1 टिप्पणी:

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना । आभार
ढेर सारी शुभकामनायें.

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com