मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

ना पीड़ा ,ना है संताप.....


छू जाते हैं
मन को मेरे ,
भाव कोई जब
सरल सरल ...
अंतर्मन के
गहन तलों में
हो जाता कुछ
तरल तरल ....

छा जाते हैं
मेघ घनेरे ,
रुंधा रुंधा गला
हो जाता ,
विरह व्यथा
कुछ यूँ बढती है
स्मित मेरा कहीं
खो जाता ..
हृदय समेटूं
अश्रु अपने ,
अंखियों से जाते
छलल छलल ...
अंतर्मन के
गहन तलों में
हो जाता कुछ
तरल तरल .........

अंसुअन का
यह रूप अनूठा ,
ना पीड़ा ,
ना है संताप ...
अर्पण है
आराध्य को मेरे
भोग, प्रार्थना
यही है जाप ..
मन को निर्मल
करने हेतु
बहती धाराएं
मचल मचल .....
अंतर्मन के
गहन तलों में
हो जाता कुछ
तरल तरल ....

4 टिप्‍पणियां:

Anupama Tripathi ने कहा…

निर्मल मन की बहती पावस धारा ...
सुंदर रचना ...

vandan gupta ने कहा…

ना पीड़ा ,ना है संताप ये तो है बस आत्मालाप बहुत सुन्दर भाव समन्वय्।

Anita ने कहा…

बहुत सुंदर भाव !

नीरज गोस्वामी ने कहा…

गहरे और सुन्दर शब्द...इस भावपूर्ण रचना के लिए बधाई स्वीकारें

नीरज