रविवार, 5 जून 2011

तुम्हारी पुकार ...

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तुम्हारी पुकार पर
मेरी
आतुर प्रतिक्रिया देख
कहा था तुमने
कि
जानता हूँ मैं
चली आओगी
तुम
चिता से भी उठ कर
देने प्रतिउत्तर
मेरी पुकार का ...

कहीं ये न हो
कि
चिता की
बुझती हुई
अंतिम चिंगारी
तक भी
जलती ही रहे
लौ आस की
सुनने को
पुकार तुम्हारी
मेरे
खाक होने से पहले.... .

5 टिप्‍पणियां:

दीपक बाबा ने कहा…

एक बाबा भी पुकार रहा था..... सरे बाज़ार लाठी चली.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

bahut hi achhi rachna

Anupama Tripathi ने कहा…

आस को छोड़ना नहीं है ...!!
उम्मीद बनाये रखना है ..
सुंदर रचना..!!

Dr. Zakir Ali Rajnish ने कहा…

मन को छू जाने वाली पुकार।

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मेरे ख़ुदा मुझे जीने का वो सलीक़ा दे...
मेरे द्वारे बहुत पुराना, पेड़ खड़ा है पीपल का।

vandan gupta ने कहा…

बेहद मार्मिक चित्रण्।