गुरुवार, 2 जून 2011

बस वही इक रंग है ....

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ये ख़्वाब है !
या है हक़ीक़त
तस्सवुर मेरा
या
तुम्हारे
वस्ल का
दिलकश
ढंग है ...

इर्द गिर्द मेरे
कभी
दिखते तो नहीं हो ,
फिर
लिपटा हर घड़ी
ये कौन मेरे
संग है ...

महक उठी हैं
सांसें मेरी
होने के
एहसास से
जिसके
धडकनों में भी
ज्यूँ
बज उठा
मृदंग है ....

भर दी ही
रग रग में
किसने
ये शराब सी ,
छाई अंग अंग
कैसी ये
तरंग है ...

गुनगुनाती हूँ
बेखयाली में
नज्में तुम्हारी,
खिल रहा
लफ़्ज़ों में मेरे
बस वही इक
रंग है ....

9 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

मन के भाव को अभिव्यक्त करती नज़्म अच्छी लगी।

vandan gupta ने कहा…

वाह ……………मनोभावों का खूबसूरत चित्रण्।

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (04.06.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:-Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)
स्पेशल काव्यमयी चर्चाः-“चाहत” (आरती झा)

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया.

बाबुषा ने कहा…

Rangi rahiye !
Dobaara kah dun ...aap har din sundar hoti ja rahi hain ! :-)

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर..

Rakesh Kumar ने कहा…

सुन्दर भावों की अनुपम अभिव्यक्ति.
'बस वही एक रंग है ..' जो दिल को रंग गया.

मुदिता जी, मुझे आपका मेरे ब्लॉग पर आने का इंतजार है.

केवल राम ने कहा…

भर दी ही
रग रग में किसने
ये शराब सी ,
छाई अंग अंग
कैसी ये तरंग है ...

आदरणीय मुदिता जी
मन के भावों को एक नए अंदाज में अभिव्यक्त कर आपने एक सार्थक रचना की, रचना की ....आपका आभार

Vinesh ने कहा…

सदाबहार है ये एहसास. बहुत सुन्दर तरह से उकेरा है आपने मनोभावों को. अनूठा सृजन.