बुधवार, 28 जुलाई 2010

अरमान-(आशु रचना )


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बड़े जतन से
बहला फुसला कर
छुपाये थे पंख
मैंने
अरमानो के अपने....
बरसों बरस
नहीं था
एहसास
पंखों के
होने का
इनको ....
पर
आने के साथ ही
तुम्हारे
जान गए हैं
अस्तित्व
अपने पंखों का
मेरे अरमान .....
लाख समझाने पर भी
उड़ लेते हैं
फडफडा के पंख
विस्तृत नभ में ...
लेकिन .!!
अब बहुत दिन हुए
उड़ नहीं पाए हैं
अरमान मेरे,
भीगे पंखों को
समेटे बैठे हैं
उस बारिश के बाद
जो बरसी थी
वक्त-ए -जुदाई
नैनों से अपने ...
नहीं निकला है
तब से
तेरी
आवाज़ का सूरज भी
आओ न !!
तोड़ के
तिलिस्म
बादलों का
दिखा दो न
धूप
मेरे अरमानो को...



9 टिप्‍पणियां:

Avinash Chandra ने कहा…

आओ ना!

इतना अच्छा है, बहुत अच्छा..

मुदिता ने कहा…

avinash... pehle bhi ek rachna mein likha tha tab tumne yahi kaha tha.. aur aaj likhte huye dhyaan tha ki is aao naa!! mein bada asar hai :)

Ra ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
Ra ने कहा…

अच्छा सृजन...!!! ,,कुछ पंक्तिया बहुत कुछ कहती हुई ,,,!!! ,,,,इस सुन्दर रचना के लिए बधाई और आभार ...शब्दों के इस सुहाने सफ़र में आज से हम भी आपके साथ है ,,,चलो साथ मिलकर चलते है ,,,शायद सफ़र कुछ आसान हो जाए ...?

Deepak Shukla ने कहा…

Hi..

Duniya main gar vikat hai kuchh to,
wo hai virah vyatha ka dansh..
Hruday tutkar bikhra rahta..
Bheege armanon ke pankh..
Priyatam jab mil jaata hai tab..
Man spandan se bhar jaaye..
Khushiyon ki jo dhup khile jo..
Man ka panchi ud jaaye..

Sundar bhavabhivyakti..

Deepak..

Avinash Chandra ने कहा…

Di!

Mujhe bhi yaad tha... bahut apna sa aur bahut andar tak ka lagta hai ye aao na!

bahut balwan hai... :)

मुदिता ने कहा…

rajendra ji avem deepak ji bahut shukriya....

Avinash.. kya ittifaak hai ki wo "AAO naa !!" bhi maine pankhon ki rachna par hi likha tha... wahan waqt ke pankh the yahan armaano ke.. lagta hai pankhon ka astitva gehra juda hai is "AAo na" se :)

अनाम ने कहा…

bahut khub...
sach mein mann baar baar yahi keh uthta hai..
aao na...

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत दिनों बाद इतनी बढ़िया कविता पड़ने को मिली.... गजब का लिखा है