गुरुवार, 15 जुलाई 2010

क़दमों के निशाँ

खोजती हूँ
पदचिन्ह
तुम्हारे ,
दरिया-ए -वक्त
के साहिल की
रेत पर ...

रख कर
कदम
अपने ,
तेरे
क़दमों के
निशाँ पर,
पाती हूँ
सुकूँ ,
खुद को
तेरी
हमसफ़र
समझ  कर ...

लेकिन
हर
अगले
पल की 
लहर
मिटा
देती है 
वे चिन्ह
पहुँचती हूँ
तुम तक
मैं
जिनको
छू कर .....

धकेल
देती है
कश्ती
तुम्हारी ,
वक्त की
लहरें,
परे मुझसे ,
हो जाते हैं
दूर हम
मजबूर
हो कर
 ...

मैं गुम सी
साहिल पर
खड़ी
ढूंढती हूँ 
जाने क्या !
क़दमों के
निशाँ तो
बनते नहीं
हैं ना
पानी पर....!!!

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प्रत्युत्तर..

कभी कभी किसी पल किसी मानसिक अवस्था के तहत कुछ सवाल उठते हैं और उन्ही सवालों के जवाब किसी दूसरे पल स्वयं से ही मिलने लगते हैं ....इस रचना का प्रत्युत्तर जो मन की गहराईयों से ..स्वयं की अनुगूंज सा उभर कर आया ..आप सबसे शेयर कर रही हूँ..

पहली रचना में जो सोच किसी को केन्द्र में रख कर लिखी गयी है.. उस सोच का प्रत्युत्तर उस किसी की तरफ से लिखने की कोशिश करी है ..


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खोजा करते हैं
पाँव के
निशानों को
जो,
होती नहीं
कुवत
उनमें
अपनी राहें
बनाने की ..

तुम नहीं हो
उनमें से
फिर क्यों
होकर
महकूम
मोहब्बत की
खोजती हो
निशाँ ऐसे
जो नहीं
मुझ तक
सिर्फ ,
जा सकते हैं
और भी कहीं .....

हमसफ़र तो
चलते हैं
संग संग
कदम दर कदम ,
नहीं भूलते
बेदारी
अपनी
रख कर
कदम पर
कदम....

लहरों के
हाथों
लिखा हो
मिटना
जिनका
अहमियत
क्या
ऐसे
निशानों की
जिंदगी में
अपनी

हर छोड़ा हुआ
निशाँ
पहुँचता है
इसी
अंजाम तक,
उड़ो !
उड़ान अपनी ,
पहुंचाएगी
तुम को
वही तो
मुझ तक
उड़ने को साथ
बेपायाँ
फलक में ..

मजाल
क्या है
वक़्त की
जो धकेले
कश्ती को
हमारी,
वक़्त
हम से हैं
हम
वक़्त से नहीं..

क्यों खोजती हो
रूक कर
उनको
जिनका नहीं
वुजूद कोई,
माज़ी के
निशाँ है बस
महरूम
ज़िन्दगी से...

देखते
रहने से
सतह
पानी की
नहीं
मिला करते
गौहर ,
छोड़
साहिल को
होगा डूबना
हमें
मंझधार में,
लगायेंगे गोते
और तैरेंगे भी,
और
जा पहुंचेंगे
उस पार...
उस पार...

मायने --

कुवत-सामर्थ्य
महकूम -गुलाम
बेदारी -जागरूकता
अहमियत-महत्व
बेपायाँ-असीम
फलक-आकाश
वजूद-अस्तित्व
माज़ी-विगत
गौहर -मोती
 
 
 

12 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सुन्दर....विमुग्ध सी करती रचना..

Rajkumar ने कहा…

यह दास्तान है ख़ूबसूरत
कि रेत पर बनती है निशाँ
मिट जाने को,
दो पल फिर भी
कम क्या हैं
जी लेने को?

कश्ती के हिचकोलों पर,
हर पल के सहारे
मिटना, बनना,
बनकर मिटना,
पाना, खोना,
खोकर पाना,
अपने, सपने,
जाने-माने,
बेगाने एहसास किसी के...
वल्लाह-वल्लाह,
यही खज़ाना,
अब क्यों ढूंढें,
क्यों पायें?

Deepak Shukla ने कहा…

Hi..

Kavita main hi prashn uthaya..
Kavita main suljhaya hai..
kavita ka pratyuttar tumne..
Bhavon se samjhaya hai..

Dono kavitayen ek doosre ki purak hain..unke kalpanik rachayitaon ki tarah..

Deepak..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मंगलवार २० जुलाई को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

दिपाली "आब" ने कहा…

:) बहुत खूब

Sadhana Vaid ने कहा…

सवाल और जवाब दोनों ही बेमिसाल हैं ! जब तक पहली रचना दिल दिमाग को अपनी गिरफ्त में ले उदासी के अँधेरे में धकेलने लगती है दूसरी रचना उसकी दवा ले कर अगले ही पल हाज़िर हो जाती है ! बहुत खूब !

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

दोनों रचनाये पढ़ी...जवाब वाली रचना ने मानो दिल में उत्साह भर दिया.

दोनों रचनाये बहुत बहुत अच्छी.

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत खूबसूरत रचना

नीरज गोस्वामी ने कहा…

दोनों रचनाएँ विलक्षण हैं और आपमें अपार संभावनाएं हैं साहित्य के क्षेत्र में अपना स्थान बनाने की ...बधाई..

नीरज

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज प्रत्युत्तर भी पढ़ा...दोनों रचनाएँ मन में उतर गयीं...सच है कि जिनका लहरों के हाथों मिटना नसीब हो उनके पीछे क्या सोचना ? बहुत सुन्दर

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

बहुत अच्छा....मेरा ब्लागः"काव्य कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com .........साथ ही मेरी कविता "हिन्दी साहित्य मंच" पर भी.......आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे...धन्यवाद

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

बहुत अच्छा....मेरा ब्लागः"काव्य कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com .........साथ ही मेरी कविता "हिन्दी साहित्य मंच" पर भी.......आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे...धन्यवाद