शुक्रवार, 20 मार्च 2020

'आपदा' भी एक 'अवसर'...


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चेताया है कुदरत ने
अनगिनत बार
अहंकारी मानव को ,
किन्तु अपने गुरुर में डूबा वो
करता रहा निरंतर दोहन
प्राकृतिक संपदाओं का
नहीं सीखा उसने करना सम्मान
मातृस्वरूपा धरा का
जान ही नहीं पाया वह
अपने भटकाव को
अंध प्रतिस्पर्धा में झोंक कर
स्वयम को
भूल बैठा कि
जीवन नैसर्गिक है
जीवन सहज और सरल है ...

एक बार फिर से
चेता दिया है प्रकृति ने
दिया है उसने अवसर
विश्व व्यापी "आपदा"
कोरोना के रूप में.....
अनायास "अवसर"
खुद में सिमट आने का
जड़ों तक लौट जाने का
थम के स्वालोकन करने का
आडम्बरपूर्ण आयोजनों से मुक्त
खुशियों के उत्सव मनाने का
भूले बिसरे पलों को
प्रियजनों संग शिद्दत से जी पाने का...

हो जाएं संवेदनशील
विनम्र ,कोमल और समर्पित
सहअस्तित्व के लिए
कर लें सम्मान
स्वयं के साथ अन्यों का भी
नहीं है कोई महत्व हमारा
हो कर पृथक अस्तित्व से
यही है संदेश प्रकृति का
समग्र मानवता के लिए..


गुरुवार, 12 मार्च 2020

एहसास होने का तेरे......


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ये लम्हा वस्ल का ,
हिज्र की सदियों पे भारी है
एहसास होने का तेरे
खुशबू की मानिंद मुझपे तारी है .....

तेरे आगोश में सिमटे
तो जाना राज़ ये दिल का
हर इक धड़कन में सीने की
कुछ अपनी हिस्सेदारी है ....

तड़प रूहों की कब ठहरी है
बन्ध कर जिस्म में जानां !!!
मगर रिश्ते हैं दुनियावी ,
निभानी जिम्मेदारी है ....

सुकूँ-ए-दिल की निस्बत
है हमारे साथ होने से
ना जाने कितने जन्मों से
ये अपनी साझेदारी है....

कभी हो काश ऐसा
मिल सकें बेख़ौफ़ तुम से हम
यूँ अपने ही पलों पर
ग़ैरों की क्यूँ दावेदारी है .....

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

ज़रा सी देर लगती है....


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हँसी होठों पे देखो तो कभी धोखा ना खा जाना
ग़मों को अश्क़ बनने में ज़रा सी देर लगती है .....

समझना खुद को ना तन्हा,कठिन है राह ये माना
सफ़र में साथ मिलने में ज़रा सी देर लगती है

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

होना तेरा.....


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होना तेरा...तेरे ना होने में
हर्षाये रहता है मुझ को,
एक खुशबू अजानी सी
महकाये रहती है मुझे....

बोसा तेरा नर्म सा
ज़बीं पे मेरी
पिघलाए रहता है मुझको
बेख़ुदी मेरी
ख़ुद से ही
मिलवाए रहती है मुझे...

आगोश तेरा...
मुक्त बाँहों के घेरे में
समाए रहता है मुझको,
इक छुअन कोमल
सिहराये रहती है मुझे.....

एक साया ...अनदेखा सा
लिपटाये रहता है मुझको,
इक धड़कन ,
लेती हुई नाम मेरा
बहलाये रहती है मुझे....

एहसास तेरा इर्द गिर्द अपने
बहकाये रहता है मुझको
सरगोशी नर्म सी
मेरी रूह में
थिरकाये रहती है मुझे .....

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

तेरे ही नज़ारे....


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कैसे लिखूँ मैं
गीत, छंद
नज़्में, ग़ज़लें
भटक गए आखर सारे
भाव जगत में खो गई ऐसे
गुम हो गए एहसास के धारे
हो रहा था इश्क़-ए-हक़ीक़ी
नुमायाँ मेरे रौं रौं से
बिन लिखे भी थे हरसूँ
ए मोहब्बत ! बस तेरे ही नज़ारे ........

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

तुझ बिन जिया उदास.....


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सुबह का सूरज
अंधियारे में
लाये किरणों का उजास
फिर जग जाती
मिलन की तुझसे
गहरी सी इक आस
पल पल राह तके ये नैना
तुझ बिन जिया उदास ....

थम जाए ये दीठ ए साथी!
जब देखूं तोहरी सूरत
पूजा तू ही
मन्त्र  तू ही है
तू मन मंदिर की मूरत
अब तो आ जा
हाथ थाम ले
सुन मेरी अरदास
तुझ बिन जिया उदास.....

मोहन तू छलिया है इतना
राधा को तरसाये
रुक्मन तेरे विरह वियोग में
नयनन नीर बहाए
मीरा गाये प्रेम वेदना
ले ले कर उच्छवास
तुझ बिन जिया उदास......

पल छिन साथ प्रतीत है तेरा
पर तड़पूँ मैं दिन रैन
झलक तेरी दिख जाए दम भर
मिले हिय को चैन
सूख ना पाती भीगी पलकें
क्यूँ तुझ को ना एहसास
तुझ बिन जिया उदास.....

रविवार, 17 नवंबर 2019

ख़ुद की मौज में....


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कर रही है खुशगवार
रातरानी की यह मादक महक
मुझको...
लदी हुई हैं शाखें
कोमल उजले सफेद फूलों से,
खिल उठते हैं हममिजाज़ मौसम में
गुंचे गुलों के
बिना किसी इंतजार
बिना किसी उम्मीद
बिना इस सोच के
कि इस खुशबू को
कोई महसूसेगा या नहीं,
सार्थकता  है 'होने' की
बस  खिलने
और सुगंध बिखेरने में ही,
होते होंगे बहुतेरे
जो चले जाते हैं अनछुए से
गमकती हुई रातरानी के वजूद से
मगर नहीं होता मायूस
कोई बूटा
नहीं रोकता
खिलने से फूलों को
ना ही कहता है
उन बेहिस लोगों से
कि रुको देखो
कितना लदा हूँ मैं फूलों से
महसूस करो ना तुम
मेरी खुशबू को ,
कैसे कर सकते हो तुम
नज़रअंदाज़ मेरी मौजूदगी की
लेकिन 'होना' उसका
नहीं है निर्भर  किसी पर भी
वो तो है खुश ख़ुद की मौज में
नहीं करता अपेक्षा 
किसी की चाहत या तारीफ की ,
कर रहा है सराबोर
फ़िज़ा को अपनी खुशबू से,
जो महसूस करे
करम उसपे मौला का
ना कर सके तो
बदनसीबी उसकी....