रविवार, 8 अप्रैल 2012

तेरा होना है.....

तेरा होना है
ज़िन्दगी मेरी ,
देखना तुझको
बंदगी मेरी ,
तुझको
खो खो के
मैंने पाया है
अब मिटी जा के
तिश्नगी मेरी ...

यूँ सहेजा है
इक अनाम सा कुछ ,
के जैसे
आब-ए-शब
गुलों पे हो ,
ना लगे धूप
इस जहां की सनम
इससे कायम है
ताज़गी मेरी.....

संग अपना है
हर लम्हा हासिल,
जैसे लहरों के संग
रहे साहिल ,
तेरी नज़रों में
जो उजाला है
उससे रोशन है
तीरगी मेरी ...

1 टिप्पणी:

परमजीत सिहँ बाली ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।