शनिवार, 26 नवंबर 2011

करामात ...

चलती नहीं कलम 
ना जाने क्या बात है, 
हैं विलुप्त शब्द सारे 
भावों की बस बरसात है....

कैसे समा लूँ ,बोल !
सीमित शब्दों में धारा को,
तड़पती रूह है मेरी
कि तोडूं तन की कारा को,
बिखेरूं आज कण कण में
मिला जो मुझको तेरे साथ है....

ना जाने कब मिले थे हम
ना जाने कब के बिछुड़े है ,
पहचाना रूह ने रूह को
भले ही बदले जो कपडे हैं
हम जन्मों से  वे ही संगी
कुदरत की ही करामात है

7 टिप्‍पणियां:

vandan gupta ने कहा…

ना जाने कब मिले थे हम
ना जाने कब के बिछुड़े है ,
पहचाना रूह ने रूह को
भले ही बदले जो कपडे हैं
हम जन्मों से वे ही संगी
कुदरत की ही करामात है

यही तो सत्य है।

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बहुत अच्छी रचना

नीरज

देवेंद्र ने कहा…

सही कहा आपने, रिश्ते तो जन्मजन्मांंतर के ही होते हैं, बस हम समझ नही पाते। सुंदर व भावप्रद कविता।

दीपक बाबा ने कहा…

जन्मों का रिश्ता है जी... अच्छे शब्द दिए भावनायों को...

Deepak Shukla ने कहा…

Hi...

Tera jo es janam main hai..
Kya jaanen us janam hoga..
Jise milna hai milta wo..
Usi se bas milan hoga..

Jo meri rooh hai tan main..
Kahan kho jayegi jakar..
Chaurasi lakh yoni main..
Kaun jaane kidhar hoga..

Aalaukik kavita..

Deepak Shukla..

कुमार संतोष ने कहा…

सुंदर रचना
ढेरो सुभकामनाएँ !

रजनीश तिवारी ने कहा…

पहचाना रूह ने रूह को
भले ही बदले जो कपडे हैं
हम जन्मों से वे ही संगी
कुदरत की ही करामात है
bahut sundar