गुरुवार, 24 नवंबर 2011

अनासक्त प्रेम



समझ कर
मेरे प्रेम को
आसक्ति ,
समझ लेते हो
मेरी अनासक्ति को
विरक्ति मेरी
और
डोलते रहते हो
आसक्ति
और
विरक्ति के
इन दो ध्रुवों के मध्य
पेंडुलम की भांति

जबकि !
होती हूँ मैं
सदैव स्थिर
अपने अनासक्त प्रेम में ,
स्वयं प्रेम हो कर

4 टिप्‍पणियां:

Rakesh Kumar ने कहा…

मुदित हूँ.
पर अब चुप रहूँगा जी.

Unknown ने कहा…

मेरे प्रेम को
आसक्ति ,
समझ लेते हो
मेरी अनासक्ति को
विरक्ति मेरी....न इस पहलू चैन न उस करवट आराम...डोलते रहना ही नियति हो जिसकी

दिगम्बर नासवा ने कहा…

खूबसूरत शब्दों का ताना बाना बुना है ...

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बेजोड़ रचना...बधाई

नीरज