सोमवार, 19 जुलाई 2010

चाहत ...

पूछा था उसने
" साथ मेरे
क्या मिल रहा है ,
जो चाहती हो तुम ??"
निहारा था
निर्निमेष
उसे
मैंने,
दिल से
उठी आवाज़ को
पहुँचाया था
उस तक
अनकहे
अलफ़ाज़
और
मुस्कुराती आँखों के
ज़रिये...
मुस्कुरा दिया था
यह अनकहा
सुन कर
वो भी
"इस
नायाब साथ
के बाद
कुछ और
चाहना
बाकी ही
कहाँ !!!" .......

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और मेरी इस नज़्म को पढ़ कर मेरे अभिन्न मित्र की  प्रतिक्रिया  कुछ यूँ थी

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अजीब सा
सवाल था
उसका,
नज़रों को 
देख कर
कर रहा था
वो अनदेखा..

या था वो
नासमझ
नादां और
भोला,
तभी तो उसने
शबनम को
समझा था
शोला..

महसूस कर
एहसासों को भी
पूछ रहा था वो
शायद
खुद से ही खुद
जूझ  रहा था वो..

चाहत और
राहत को
अल्फाज़ देने की
हर कोशिश
होती है
नाकामयाब,
क्या कह सकता है
तफसील से
कोई अपनी
रातों का ख्वाब !

कुछ बातें
होती है
इतनी नायाब,
अच्छा होता
लफ़्ज़ों से
नहीं बस
मुस्कान से देती
तुम जवाब..

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

चले जाने को हैं अब वो....

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चले जाने को हैं  अब वो
ये दिल बेकल हुआ है यूँ
कि उनके प्यार की  खुशबू
जरा  साँसों में मैं भर लूँ

सजा लूँ मैं बदन  अपना
छुअन से उनके होठों की
चढ़े रंग यूँ  मोहब्बत का
खिले जैसे बसंत हर सूं

निगाहें गर मिलीं  उनसे
अयाँ हो जायेगी हालत
सिमट के उनकी बाहों में
छुपा लूं आँख के आंसू

मिलन के दिन बहुत छोटे
विरह की रात है लंबी
तड़प इस दिल की है कैसी
ये वो समझे या मैं जानूँ ...
चले जाने को हैं अब वो
ये दिल बेकल हुआ है यूँ .....

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

क़दमों के निशाँ

खोजती हूँ
पदचिन्ह
तुम्हारे ,
दरिया-ए -वक्त
के साहिल की
रेत पर ...

रख कर
कदम
अपने ,
तेरे
क़दमों के
निशाँ पर,
पाती हूँ
सुकूँ ,
खुद को
तेरी
हमसफ़र
समझ  कर ...

लेकिन
हर
अगले
पल की 
लहर
मिटा
देती है 
वे चिन्ह
पहुँचती हूँ
तुम तक
मैं
जिनको
छू कर .....

धकेल
देती है
कश्ती
तुम्हारी ,
वक्त की
लहरें,
परे मुझसे ,
हो जाते हैं
दूर हम
मजबूर
हो कर
 ...

मैं गुम सी
साहिल पर
खड़ी
ढूंढती हूँ 
जाने क्या !
क़दमों के
निशाँ तो
बनते नहीं
हैं ना
पानी पर....!!!

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प्रत्युत्तर..

कभी कभी किसी पल किसी मानसिक अवस्था के तहत कुछ सवाल उठते हैं और उन्ही सवालों के जवाब किसी दूसरे पल स्वयं से ही मिलने लगते हैं ....इस रचना का प्रत्युत्तर जो मन की गहराईयों से ..स्वयं की अनुगूंज सा उभर कर आया ..आप सबसे शेयर कर रही हूँ..

पहली रचना में जो सोच किसी को केन्द्र में रख कर लिखी गयी है.. उस सोच का प्रत्युत्तर उस किसी की तरफ से लिखने की कोशिश करी है ..


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खोजा करते हैं
पाँव के
निशानों को
जो,
होती नहीं
कुवत
उनमें
अपनी राहें
बनाने की ..

तुम नहीं हो
उनमें से
फिर क्यों
होकर
महकूम
मोहब्बत की
खोजती हो
निशाँ ऐसे
जो नहीं
मुझ तक
सिर्फ ,
जा सकते हैं
और भी कहीं .....

हमसफ़र तो
चलते हैं
संग संग
कदम दर कदम ,
नहीं भूलते
बेदारी
अपनी
रख कर
कदम पर
कदम....

लहरों के
हाथों
लिखा हो
मिटना
जिनका
अहमियत
क्या
ऐसे
निशानों की
जिंदगी में
अपनी

हर छोड़ा हुआ
निशाँ
पहुँचता है
इसी
अंजाम तक,
उड़ो !
उड़ान अपनी ,
पहुंचाएगी
तुम को
वही तो
मुझ तक
उड़ने को साथ
बेपायाँ
फलक में ..

मजाल
क्या है
वक़्त की
जो धकेले
कश्ती को
हमारी,
वक़्त
हम से हैं
हम
वक़्त से नहीं..

क्यों खोजती हो
रूक कर
उनको
जिनका नहीं
वुजूद कोई,
माज़ी के
निशाँ है बस
महरूम
ज़िन्दगी से...

देखते
रहने से
सतह
पानी की
नहीं
मिला करते
गौहर ,
छोड़
साहिल को
होगा डूबना
हमें
मंझधार में,
लगायेंगे गोते
और तैरेंगे भी,
और
जा पहुंचेंगे
उस पार...
उस पार...

मायने --

कुवत-सामर्थ्य
महकूम -गुलाम
बेदारी -जागरूकता
अहमियत-महत्व
बेपायाँ-असीम
फलक-आकाश
वजूद-अस्तित्व
माज़ी-विगत
गौहर -मोती
 
 
 

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

अखंडित अस्तित्व

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बंटती हूँ
सुबह से
शाम तलक
ना जाने
कितनी बार
अलग अलग
रिश्तों में...
देता है
ऊर्जा ,
इन
टुकड़ों में
बंटने की  
मुझको ,
मेरा
अखंडित
अस्तित्व
जो होता है 
उन चंद
लम्हों में ,
होती हूँ
जब
मैं
सिर्फ
'मैं' ..
बिना नाम
और
रिश्ते के
तुम्हारे
पहलु में
तुम्हारी 
यादों में ....

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

निगाहों की आशनाई है

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मेरी नज़र में ,तेरे इश्क की रानाई है
तेरे खयाल ने लब पे  हंसी सजाई है

हुआ करे है तेरे साथ ज़िक्र मेरा भी
बहुत हसीन सनम   इश्क में रुसवाई है

थे तन्हा बज़्म में ,अजनबी चेहरों से घिरे
करार दिल का  तेरी याद ले के आई है 

तलाश आज भी है  फुरसतों के लम्हों की
गवाह जिनकी रही, सूनी पड़ी अमराई है

मेरे वजूद पे अक्स तेरा छा  गया ऐसे
पूछते लोग हैं कि  क्या  तेरी परछाई है

डुबो के खुश हूँ  सफीना तेरी मोहब्बत में
लहर जुनूं की  किनारे पे ले के आई है

धडकनें भी मेरी अब गीत तेरे गाती हैं
हुई जब अपनी निगाहों की आशनाई है

तुम्हारी याद से सोज़ां है मेरे दिल का चिराग
शम्मा है  बुझने को ,परवाना तमाशाई है !!

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

बेखुदी क्या है

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खबर नहीं कि खुदी क्या है बेखुदी क्या है
गुज़रती जाती है बस यूँही जिंदगी क्या है

चले हैं साथ तेरे छोड़ के ये रस्मों रिवाज
तेरे खयाल में जाना कि बंदगी क्या है

वो रिंद क्या जो बहक जाए चंद घूंटों में
खुदी संभाल न पाए वो मयकशी  क्या है

हर एक ज़र्रे में पाया है नगमगी का ख़लूस
जो दे सुनाई न हर सिम्त मौसिकी क्या है

खिल उठती है मेरे लब पर हंसी अकेले में
छुए बिना भी तुझे  होती गुदगुदी क्या है

नहीं है खौफ ,तेरे दिल का नूर हूँ जबसे
टिकी सहर-ए-मोहब्बत में तीरगी क्या है

मायने-

बंदगी- पूजा
रिंद- शराब पीने वाला
नगमगी -संगीत
ज़र्रे-कण कण
ख़लूस -निष्ठा
सिम्त-दिशा
मौसिकी-संगीत
खौफ-डर
सहर-ए -मोहब्बत- मोहब्बत की सुबह
तीरगी-अन्धकार

राज़ सृष्टि का....

हुआ सार्थक जीवन मेरा
मिला साथ जो तेरा
खुशियों से रीते हाथो को
मिला हाथ जो तेरा

महसूस किया तेरे होने को
हुए जो कम्पन मन में
सुना है मैंने उन बातों को
आवाज़ न होती जिनमें

साथ मिले पल भर का या फिर
जीवन बीते सारा
भरा प्रेम से मन गागर को
अमृत बन के तारा

अलग अलग दिखते हैं जग को
भेद है ये दृष्टि का
जुडी है रूहें किस बंधन से

राज़ है ये सृष्टि का

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