पूछा था उसने
" साथ मेरे
क्या मिल रहा है ,
जो चाहती हो तुम ??"
निहारा था
निर्निमेष
उसे
मैंने,
दिल से
उठी आवाज़ को
पहुँचाया था
उस तक
अनकहे
अलफ़ाज़
और
मुस्कुराती आँखों के
ज़रिये...
मुस्कुरा दिया था
यह अनकहा
सुन कर
वो भी
"इस
नायाब साथ
के बाद
कुछ और
चाहना
बाकी ही
कहाँ !!!" .......
" साथ मेरे
क्या मिल रहा है ,
जो चाहती हो तुम ??"
निर्निमेष
उसे
मैंने,
दिल से
उठी आवाज़ को
पहुँचाया था
उस तक
अनकहे
अलफ़ाज़
और
मुस्कुराती आँखों के
ज़रिये...
यह अनकहा
सुन कर
वो भी
"इस
नायाब साथ
के बाद
कुछ और
चाहना
बाकी ही
कहाँ !!!" .......
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और मेरी इस नज़्म को पढ़ कर मेरे अभिन्न मित्र की प्रतिक्रिया कुछ यूँ थी
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अजीब सा
सवाल था
उसका,
नज़रों को
देख कर
कर रहा था
वो अनदेखा..
या था वो
नासमझ
नादां और
भोला,
तभी तो उसने
शबनम को
समझा था
शोला..
महसूस कर
एहसासों को भी
पूछ रहा था वो
शायद
खुद से ही खुद
जूझ रहा था वो..
चाहत और
राहत को
अल्फाज़ देने की
हर कोशिश
होती है
नाकामयाब,
क्या कह सकता है
तफसील से
कोई अपनी
रातों का ख्वाब !
कुछ बातें
होती है
इतनी नायाब,
अच्छा होता
लफ़्ज़ों से
नहीं बस
मुस्कान से देती
तुम जवाब..
सवाल था
उसका,
नज़रों को
देख कर
कर रहा था
वो अनदेखा..
या था वो
नासमझ
नादां और
भोला,
तभी तो उसने
शबनम को
समझा था
शोला..
महसूस कर
एहसासों को भी
पूछ रहा था वो
शायद
खुद से ही खुद
जूझ रहा था वो..
चाहत और
राहत को
अल्फाज़ देने की
हर कोशिश
होती है
नाकामयाब,
क्या कह सकता है
तफसील से
कोई अपनी
रातों का ख्वाब !
कुछ बातें
होती है
इतनी नायाब,
अच्छा होता
लफ़्ज़ों से
नहीं बस
मुस्कान से देती
तुम जवाब..