शनिवार, 3 नवंबर 2012

नयी-पुरानी जितनी गांठें .....

गांठे ,कितनी उलझी गांठें !!

मन की चादर के सब धागे
उधड़े -बिखरे सुलझे उलझे
सिरा पकड़ जब खींचूं मैं
लग जाती हैं कितनी गांठे !

कुछ प्रमाद के कारण लगतीं
कुछ न जाने लगती क्यूँ कर
सजग रहूँ यदि, दिख पाएंगी
नयी-पुरानी जितनी गांठें .....

बुनना है अपनी चादर को
गाँठ रहित समतल व कोमल
इक इक धागा पकड़ पकड़ कर
सुलझा पाऊँ मनुआ गांठें ....

गांठे , कितनी उलझी गांठें
धैर्य से मेरे सुलझी गांठें
नहीं रहेंगी , नहीं टिकेंगी
ये अधसुलझी ,कुंठित गांठें

गांठें , कितनी उलझी गांठें ..!!! 

4 टिप्‍पणियां:

vandan gupta ने कहा…

बेबस मन की यही व्यथा

संगीता पुरी ने कहा…

जीवन भर सुलझाते ही जाना पडता है इन गांठों को

देवेंद्र ने कहा…

यही तो है , जितनी होशियारी हम दिखाते हैं इसे सुलझाने में उतना ही यह उलझता है, वरना तो सरलता व प्यार से सहज सुलझ जाता है।माँ की थपकी सी सहजता और प्रेम से सुलझ-श्रांत हो जाता है मन।बाकी सब तो उसको उलझाता विकृत करता है।

neel ने कहा…

कुछ गांठों को न खोलना ही बेहतर .. जिंदगी की चादर सहेजने में सुविधा रहती है .. यथार्थपरक तथा गहरी रचना