शनिवार, 19 मार्च 2011

व्यवधान ....

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देखा है न नदी को !!
कितना
शोर करती है
उसकी लहरें ,
उछलती ,
उफनती ,
उत्पाती सी
लगती है
जब मिलता है
उसके जल को
व्यवधान
चट्टानों का ,
कहते तो नहीं
इसे
'उद्दंडता"
नदी की ,
दुनिया वाले !!

हो ही जाता है
कभी - कभी
विध्वंसक
अनपेक्षित
व्यवधानो
के होने की
स्थिति में ...

किन्तु !!
देखा है न तुमने !
वही जल
बहता है
शांत ,
संयमित ,
गरिमामय'
सहज
गति से
व्यवधानों से मुक्त
समतल धरा पर ...

जल तो
है ही ऐसा,
बना लेता है
अपना रास्ता
अपनी
सहज प्रवृति
के कारण
व्यवधानों के
बावजूद भी ।



3 टिप्‍पणियां:

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) ने कहा…

जल तो
है ही ऐसा,
बना लेता है
अपना रास्ता
अपनी
सहज प्रवृति
के कारण
व्यवधानों के
बावजूद भी ।

मनुष्य का जीवन संघर्षों से भरा पूरा है पर जल हमें अपनी मंजिल को पाने की प्रेरणा देता है.

बहुत ही अच्छी लगी आप की यह कविता.

आप को सपरिवार होली की हार्दिक शुभ कामनाएं.

सादर

रश्मि प्रभा... ने कहा…

देखा है न तुमने !
वही जल
बहता है
शांत ,
संयमित ,
गरिमामय'
सहज
गति से
व्यवधानों से मुक्त
समतल धरा पर ...
yah bhi to ek roop hai nadi ka , bahut badhiyaa

Mayank Jain ने कहा…

bahut acchi lagi kavita maa'm :)