मंगलवार, 11 जनवरी 2011

वो पांच मिनट....


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सर्दियों की
ठिठुरती सुबह ,
घड़ी में
अलार्म बजने के बाद
सर तक
रजाई खींच कर
बस पांच मिनट
और ...
सो लेने की ललक...
कितने आनंदमय होते हैं ना
वो पांच मिनट ..!!

किन्तु अब ...!!!

जब बेफिक्र हूँ
घड़ी के काँटों से ..
अनजाने ही
कान करने लगते हैं
इंतज़ार
तुम्हारी आवाज़ का ...
" उठो !!
वरना देर हो जायेगी .."
और
अलार्म बंद
होने के बाद
पसरे हुए सन्नाटे में
खो जाता है
आनंद
कुछ और देर
सो पाने का .....



8 टिप्‍पणियां:

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत खूबसूरत भावपूर्ण प्रस्तुति...

अनाम ने कहा…

मुदिता जी,

वाह....बहुत खूब ....बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति है...

नीरज गोस्वामी ने कहा…

इस संवेदनशील रचना के लिए...बधाई

नीरज

रश्मि प्रभा... ने कहा…

ye 5 min ka khel, aanand ab bachche lete hain ... wo bhi ghar aane per !
is 5min kee kimat jabardast hai

मुदिता ने कहा…

कैलाश जी , इमरान जी , नीरज जी एवं रश्मि जी

आप सबका बहुत आभार रचना को पसंद करने के लिए...

@ रश्मि जी , बिलकुल सही कहा आपने ..ये पांच मिनट कितने अमूल्य होते हैं...

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

मुदिता जी,
आपने सही फ़रमाया ,लगता है उस पांच मिनट में पूरी जिंदगी समा गयी है !
सुन्दर प्रस्तुति के लिए धन्यवाद !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

mridula pradhan ने कहा…

bahut sunder.

Kunwar Kusumesh ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना . लोहड़ी और मकर संक्रांति की शुभकामनायें