शनिवार, 1 जनवरी 2011

दरवेश ...(आशु रचना )

स्वयं में विद्यमान परमात्मा के अंश को दरवेश का रूपक देते हुए अपनी अनुभूति को शब्द दिए हैं

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खोज रही थी बाहर जिसको
खुद में ही पाया जब उसको
भटकन कोई रही ना शेष
मिला मुझे ऐसा दरवेश

जीने का अंदाज़ मिला
साँसों में संगीत ढला
मन में किंचित नहीं क्लेश
जबसे साथ चला दरवेश

फक्कड़ है वो मस्त मलंग
अलग है सबसे उसका ढंग
जाने कौन सा उसका देश
यायावर है ये दरवेश

खुद की झोली भले हो खाली
बनके घूमे नहीं सवाली
प्रेम है उसके पास अशेष
ऐसा अद्भुत है दरवेश

उससे जब से लगी लगन
मन तन झूमे हुए मगन
बदल गया मेरा परिवेश
समा गया मुझमें दरवेश

3 टिप्‍पणियां:

vandan gupta ने कहा…

आपको और आपके परिवार को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये ......

सदा ने कहा…

नववर्ष की शुभकामनायें .....।

The Serious Comedy Show. ने कहा…

आत्मा को परमात्मा से मिलाने का अदभुत सौंदर्य झलकता है.