शनिवार, 17 दिसंबर 2011

बस मेरा सरमाया है....

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तेरे खत में सलाम आया है
एक भूला सा नाम आया है
खुशबू साँसों की तेरी है उसमें
तेरी नज़रों का जाम आया है

है क्यूँ रेशम सा कागज़ी टुकड़ा
बार बार चेहरे से छुआती हूँ
मेरे हाथों में जैसे हाथ तेरा
उंगलियाँ उसपे यूँ फिराती हूँ
कब लिखा जा सकेगा शब्दों में
अनकहा जो पयाम आया है
तेरे खत में सलाम आया है ...

तेरे हर्फों की जो ख़ामोशी है
गूंजती जा रही है धड़कन में
इश्क की राह में उतर लीं हैं
कितनी गहराइयां सनम हमने !
ज़िंदगी भर की खुशी दे दी है
खत तेरा ,बस मेरा सरमाया है
तेरे खत में सलाम आया है
एक भूला सा नाम आया है
खुशबू साँसों की तेरी है उसमें
तेरी नज़रों का जाम आया है ...

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

एक कविता ...

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हूँ मैं भी
एक कविता
रची गयी
उस सर्वोच्च रचनाकार की कलम से

जिसके हर लफ्ज़ में छुपे हैं
अनगिनत भाव ,
जिन्हें पढ़ने वाला
पढ़ता है
अपने ही आयाम दे कर
और रहता है इंतज़ार
रचना और रचयिता को
उस पाठक का जो
पढ़े ,
समझे और
अपना सके
रचना को
उसके निहित अर्थ में
उसकी समग्रता के साथ
टुकड़ों टुकड़ों
को जोड़ते हुए भी .....

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

एहसास.....

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उठा कर
नींद की गोद से
उस सहर
भर लिया था
मुझे
अपने ही
साये ने
आगोश में
खुद के ,

खुलने से पहले ही
पलकों को
कर दिया था
बंद
नरम गरम
छुअन से
अपनी ,

पिघल गयी थी मैं
गुनगुनाती सी
घुल जाने को,
मोम की मानिंद,

ना जाने
घुला था
वो मुझमें
या कि
मैं उसमें,
पसर गयी थी
फ़िज़ा में
महक लोबान की'

मस्जिद से
गूंजी थी
अजान ,
और
मंदिर से
उठे थे स्वर
आरती के ,

फूल खिले थे
पत्ते थे सरसराये
कलरव किया था
पखेरुओं ने ,
गा रहा था जोगी
प्रभाती
कर रही थी मैं
बातें खुद से ,

या खुदा !!
मेरे मौला !!
ये एहसास था क्या
तेरे आ जाने का ?

रविवार, 11 दिसंबर 2011

'अनाम '

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सुना है
बेनाम ,बेशक्ल
होती हैं रूहें ,
फिर भी
ना जाने क्यूँ
होते हैं
यादों के धुंधलके में
चंद नाम ,
चंद चेहरे
अपने अपने से..
लगता है कोई क्यूँ
जन्मों से
खुद सा
पहली ही
मुलाकात में
और गूँज जाता है
कोई अनाम
यादों की गलियों में
जैसे
दे रहा हो
सदा
दूसरे छोर पर
खड़ा हुआ ..

बाँध लेती है
ना जाने कैसे
कोई अदृश्य डोर
अप्रत्याशित सी
घटनाओं को ,
पकड़ कर सिरा जिसका
चीर कर
अंधियारे को ,
करता हुआ पार
हर दूरी को
पहुँच ही जाता है
कोई
'मीत'
अपने 'मन' की
तहों में बसे
'अनाम' तक
और चल पड़ते हैं
'मनमीत '
संग संग
जानिब-ए-मंज़िल
एक नयी सहर का
आगाज़ लिए ..




शनिवार, 10 दिसंबर 2011

पहली करवट ....

पहली करवट ....######

हृदय में सोये
प्रभु की
पहली करवट
कराती है
एहसास
प्रेम का
जो होता है घटित
अन्तरंग में
और
होने लगता है
दृष्टव्य
बहिरंग में...

लगने लगता है
सब कुछ
स्वयं सा
अपना सा
होती है प्रवाहित
मुक्त धारा
जो सरसाती है
तन-मन को,
नज़र आती है
खुबसूरत
हर शै कुदरत की,
हो रहा होता है
बाहर जो ,
होता है वो
बस हमारा
अपना ही
प्रतिबिम्ब

खिंच आता है
कुछ ऐसा
जीवन में
जिससे
बढ़ जाती है
ऊर्जाएं
और
होता है घटित
सामर्थ्य
उस निराकार को
आकार देने का
स्व-हृदय में...

केवल जागरूकता
हमारी
करा सकती है
पहचान हमें
उस करवट की
उस अंगडाई की
उस अवसर की
लौटने के लिए
स्वयं की ही ओर ,
हमारे अंतर में
विराजित
परमात्मा की ओर ...,

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

कोई..!!

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चुरा कर नींद
मेरी आँखों से
कैसे
सोया होगा कोई !
खयालों में
मुझे पा कर
मुझ में ही
खोया होगा कोई ...

तगाफ़ुल है
या बेज़ारी
पलट कर भी
ना देखा तो
मेरे दिल की
सदा पर
कर बहाना
सोया होगा कोई ..

ना मेरी आँख
मुंदती है
ना रहम-ए-नींद है
मुझ पर ,
कि कर महसूस
मेरी बेकली को
क्या
रोया होगा कोई !...

कटेगी रात
यूँ सारी ,
बस इक पैग़ाम की
चाह में ,
सहर होने तलक
एक लम्हा भी
ना
सोया होगा कोई ...

ना करना
तू शिकायत
मेरी आँखों की
उदासी की ,
कहेगी दास्तां वो भी
कि शब भर
रोया होगा कोई.....

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

कृपा सिंधु


कृपा सिंधु ....
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गीता के सातवें अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्‌ ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥(७-११)

मैं काम (इच्छा) और राग से रहित बलवानों का बल हूँ. हे भरतों में श्रेष्ठ (अर्जुन) सब प्राणियों में मैं धर्म के अनुकूल रहने वाली लालसा हूँ. दूसरी पंक्ति को यदि ध्यान से देखें तो भगवान ने स्पष्ट किया है कि वे धर्मविरुद्ध कामों में शुमार नहीं है. हम अज्ञानी या हम में से आसुरी वृति के लोग, अमानवीय धर्म विरुद्ध कृत्यों को भी ईश्वर की मोहर लगा कर चलने का प्रयास करते हैं.
एक पंक्ति में कहें, तो इश्वरत्व सत्य, प्रेम और करुणा है...परमात्मा कभी भी इन के विरुद्ध जो भी होता है उसमें कत्तई शामिल नहीं. ये सब निहित स्वार्थों के अपने निर्वचन हैं.

इसी भावना को ध्यान में रखते हुए एक रचना का सृजन हुआ है ..आशा है बात पहुंचेगी ...



कृपा सिंधु .....####

परमात्मा तो है
सत्य
प्रेम
और करुणा,
कैसे हो सकते हैं
वे शुमार
धर्म विपरीत
कलापों में,
ईर्ष्या ,
द्वेष
और
अहंकार में ..

दिये हैं हमें
प्रभु ने
चेतना
विवेक,
भावनाएं,
संवेदनाएं
कर सकें
जिससे हम
संपादन
सतोगुणों का,
होते हुए साक्षी
मन में उत्पन्न
हर अच्छे बुरे विचार का


आसुरी प्रवृतियां
फोड़ती है ठीकरा
अपनी
नकारात्मकता का
शीश पर
प्रभु के,
अपने हर भाव को
उन्ही का दिया
बतलाते हुए
ले कर छद्म नाम
समर्पण का ..

ले लेते हैं जान
मासूमों की
कितने ही
विवेकशून्य मानव
ज़ेहाद
या
धर्मयुद्ध के नाम पर
करते हुए दावा
खुदा का फरमान,
ईश्वर की आज्ञा
मानने का..

कैसे हो सकता है
कोई भी कृत्य ,
बिम्ब
उस ईश तत्व का,
जो हो विपरीत
शाश्वत समग्रता के !
कैसे हो सकता है
कृपा सिन्धु
असत्य
अप्रेम
और
करुणा विहीन !