सोचो ,
और ज़रा बताओ तो
कब हुआ था
हमारे रिश्ते का आगाज़ !!
बेसाख्ता
मिल गए थे
हम
यूँही राहों में
और
कर लिया था
महसूस
उस बहते हुए
दरिया को
जिसका आगाज़
जाने कहाँ है
मालूम न था हमें....
जिसका आगाज़ नहीं
अपने बस में
उसको अंजाम देना
मुमकिन है क्या
हम इंसानों को !!!!