शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2019

इश्क़ के परचम बेहतर हैं .....


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तेरी नज़रों से देखा ,पाया कुछ तो हम बेहतर हैं
तुझसे फिर भी जानेजां कुछ तो हम कम बेहतर हैं

डरना क्या अब ज़ख्मों से ,दर्द दवा हो जाएगा
दुश्मन के खंजर से तो यारों के मरहम बेहतर हैं...

ख़्वाबों की ताबीर में ना बर्बाद किया हमने क्या क्या
दुनिया की फ़ितरत से यारब अपने दमख़म बेहतर हैं..

मर्कज़ में जा कर ,खुद को पाना ही तो मंज़िल है
महवर पर ही घूम रहे क्यूँ कहते तुम हम बेहतर हैं....

रोज़ के शिकवे ,मायूसी, ये दर्द भरे नाले तौबा
ज़हरीले अमृत पीने से आबे जमजम बेहतर हैं....

ना भरमाओ दर्द छुपा कर दिल की दिल से निस्बत है
लबों पे झूठी मुस्कानों से चश्मे पुरनम बेहतर हैं.....

चर्चे सुन कर गली गली ,सुकूँ दिलों पे तारी है
गुमनामी की मौत से अपने इश्क़ के परचम बेहतर हैं...

मायने:

ताबीर-पूरा करना/complete
मर्कज़-केंद्र/centre
महवर-परिधि/circumference
आबे-जमजम-मक्का का पवित्र पानी
निस्बत-लगाव/connection
चश्मे-पुरनम-भरी हुई आंख/teary eyes
तारी-छाया हुआ/spreaded
परचम-झण्डा/flag

3 टिप्‍पणियां:

अनीता सैनी ने कहा…

जी नमस्ते,

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (१३ -१०-२०१९ ) को " गहरे में उतरो तो ही मिलते हैं मोती " (चर्चा अंक- ३४८७) पर भी होगी।
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
….
अनीता सैनी

Nitish Tiwary ने कहा…

वाह! बहुत सुंदर रचना।

मन की वीणा ने कहा…

बहुत सुंदर सृजन।।