शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

उस पार का बुलावा....



भर तो गए थे ज़ख्म
टीस मगर बाकी थी
बा-होश रहा मयकश
मदहोश हुई साकी थी

लफ़्ज़ों ने तराशा था
पत्थर चमक रहे थे
खुली अधखुली सी आँखें
कैसी ये बेखुदी थी ..

वो नहीं था अक्स मेरा
दिखता रहा जो सबको
चाहत थी आब-ए-जन्नत
दुनियावी तिश्नगी थी ...

नाखुदा बनी वो कश्ती
भंवर में जो खुद पड़ी थी
उस पार था बुलावा
लेकिन अना अड़ी थी

3 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

फॉण्ट का साइज़ बहुत छोटा हो गया है...पढ़ने में दिक्कत हो रही है

मुदिता ने कहा…

निधि ,फॉण्ट की तरफ ध्यान आकर्षित करने का शुक्रिया ..अब पढ़िए :)

Unknown ने कहा…

अना ...सब दूर्रियों की जड़