शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

किससे कहे सुने बैरागन ...

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कान्हा ही गर
ना समझे जो
व्यथा नैन के
नीर की....
किससे कहे सुने
बैरागन
बात हृदय की
पीर की .....

रह रह कसक
हृदय में उठती,
नयनन बरसे
अश्रु जल..
बाट जोहती
अँखियाँ थक गयी,
लगे बरस जैसा
हर पल...
कब तक लोगे
श्याम परीक्षा,
मूक प्रेम के
धीर की....
किससे कहे सुने
बैरागन
बात हृदय की
पीर की ....

अधिकार नहीं
जाना है
तुमपे,
है नहीं
मानिनी
राधा सी....
प्रेम किया
बस अर्पण उसने,
न तुम्हें
कभी कोई
बाधा दी....
तुम हो एक
बहता हुआ
दरिया,
संग रहे वो
तीर सी ...
किससे कहे सुने
बैरागन
बात हृदय की
पीर की .....

मीरा का
यह प्रेम
अनोखा,
दुनिया
जय जय
गान करे...
अमृत में
ढल जाता
प्याला,
मीरा
जब
विषपान करे...
हुई मुक्त वो
डूब प्रेम में,
खुली गाँठ
ज़ंजीर की....
किससे कहे सुने
बैरागन
बात हृदय की
पीर की .....






10 टिप्‍पणियां:

वाणी गीत ने कहा…

किससे कहे सुने बैरागन व्यथा ह्रदय की ..
बेहद खूबसूरत गीत ...

vandan gupta ने कहा…

ह्रदय को छूता बहुत ही भावमय गीत्।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

कान्हा ही गर
ना समझे जो
व्यथा नैन के
नीर की....
किससे कहे सुने
बैरागन
बात हृदय की
पीर की .....
is vyatha ko kaun samjhe , kaun jane !

rashmi ravija ने कहा…

मन की विवशता को बड़े सुन्दर ढंग से बताया है....प्यारी सी विरह कविता

Unknown ने कहा…

इतनी कोमलकांत और अभिनव कविता के लिए आपको हार्दिक बधाई !

kulvender sufiyana aks ने कहा…

bahut sundar prastuti.....shubhakamnaaye

abhi ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत गीत!!

अश्विनी कुमार रॉय Ashwani Kumar Roy ने कहा…

अत्यंत सुन्दर एवं भावपूर्ण कृति. बहुत बहुत साधुवाद!

vijay kumar sappatti ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता , बधाई स्वीकार करे.

विजय
poemsofvijay.blogspot.com

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar ने कहा…

कान्हा ही गर न समझे जो,
व्यथा नैन के नीर की;
किससे कहे-सुने बैरागन
बात हृदय की पीर की!

गीत का बहुत प्यारा मुखड़ा निकाला है आपने...लय- की प्रवहमानता भी इस मुखड़े में बख़ूबी निभा ले गयीं हैं आप...बधाई!