बुधवार, 10 नवंबर 2010

एक खयाल यूँही सा....


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जज़्ब करके भी
धाराएं स्नेह की
रहता है
समंद रेत का
सूखा सूखा सा..
बुझती नहीं
दोहन से रेत के
प्यास कभी
पथिक की ..
समा कर
अन्तरंग में
धरती के
फूट पड़ती है
जल की धार
पा कर
परिस्थितियाँ
अनुकूल अपने ....

5 टिप्‍पणियां:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

khyaal yun hi ..... kitna kuch kah gaye

अमिताभ मीत ने कहा…

badhiya !!

vandan gupta ने कहा…

फूट पड़ती है
जल की धार
पा कर
परिस्थितियाँ
अनुकूल अपने ....
स्नेह की दो बूंद ही जीवन का संबल बन जाती हैं।

arvind ने कहा…

bahut umda rachna..aabhaar.

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar ने कहा…

बहुत अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर!