बुधवार, 8 अगस्त 2018

"नादाँ मैं"

अंजुरी भर के 
मोती
लाया था कोई
सागर तल से 
और मैं
लहरों की फेंकी 
टूटी सीपियाँ 
चुनने में व्यस्त थी....

गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

कभी हँसी बन झरती पीर....

जीवन अपना
जलधि जैसा
अथाह असीम
तरल ज्यूँ नीर,
कहीं चपलता
लहरों जैसी
कहीं बहुत
गहन गम्भीर ,
कहीं शांत है
बिलकुल मौन
कहीं सुरों सम
बजते तीर,
कभी परिपक्व
अबोल धैर्य है
कभी बालक
चंचल अधीर
सरल सहज
भावों का समन्वय
मिलन ,बिछोह
बेताबी ,धीर
कभी खुशी से
बहते आँसू
कभी हँसी बन
झरती पीर.....

रविवार, 7 जनवरी 2018

मुश्किल क्यों है आसां होना


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बेहिस भीड़ में इन्सां होना
मुश्किल क्यों है आसां होना....

तक़रीरें होती बात बात पर
जीते हैं बस शहो मात पर 
चतुर सुजानो की बस्ती में
कितना मुश्किल नादां होना....

मज़हब के झूठे अफ़साने 
लगे हैं ज़ेहन को भरमाने
हर शै पाएं कृष्ण मोहम्मद
मुश्किल इसका इमकाँ होना....

रूहें हैं जन्मों की संगी
जिस्म भले मशरे के बंदी
इश्क़ में उनके इश्क़ हो गए
मुश्किल अब तो मिन्हा होना.....

दुनिया जिसको टोक न पाए
राह तारीकी रोक न पाए
रोशन खुद जो जलवा हो कर
मुश्किल उसका पिन्हा होना.....

मायने-

बेहिस-असंवेदनशील
इमकाँ-संभावना
मशरे-समाज
मिन्हा-कम
तारीकी-अंधेरा
पिन्हा-छुपा हुआ

छोटे छोटे एहसास


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ख़्वाबों में 
बन हक़ीक़त 
चले आते हो क्यूं.
छुअन से 
रौं रौं को 
जगाते हो क्यूं....
बढ़ाती हूँ हाथों को 
कि छू लूँ तुम्हें 
न हो कर भी यूँ 
पास आते हो क्यों......

मंगलवार, 24 मार्च 2015

परछाई


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धूप - छाँव 
की कला है अद्भुत 
कहलाती जो
परछाई ...
कभी लघु
कभी वृहद्  
रूप में
ढलती रहती 
परछाई !....


अस्तित्व लगे 
परछाई का 
हो धूमिल भी 
प्रकाश अगर, 
गुम हो जाती 
घोर तिमिर में 
नहीं आती ये 
कतई नज़र,
मन के भय
साकार हो उठते 
दिखे  पृथक  जब 
परछाई ......

छुपा हुआ 
परछाई में
रहस्य भरा
संसार ,
मात्र भ्रम हैं
दृष्टि के  
दिखते जो
कई आकार,
कुछ  होता
कुछ और ही दिखता
उलझन ,
समझ न आई,

परछाई बस
है एक रूपक
जो दिन रजनी से
जुड़ जाता
अंधियारे में
घिरे हुओं को
साया
नज़र नहीं आता
संग छोड़ दे 
परछाई तो
विकट  बड़ी
तन्हाई  ......

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

धुंध में घिरा मन ....

धुंध में घिरा,
विचारों के
उलझे धागों में
फंसा मन
शब्दों का ही नहीं
मौन का भी
अर्थ-अनर्थ
कर बैठता है ...
मौन को सुनने
होना होता है मौन ही
उतरना होता है
अंतरंग में
विस्मृत कर
बहिरंग को,
होता है घटित
सहज सा ध्यान
और हो जाता है
स्वत:  ही
समन्वय और संतुलन
शब्द और मौन का,
क्रिया और  प्रतिक्रिया का,
अंतरंग  और   बहिरंग का...
और हो पाती है
अनुभूति
द्वैत के मिथ्यात्व की
अद्वैत के अस्तित्व की..

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

ज़िंदगी नहीं शह और मात ......

न जाने 
कब और क्यूँ 
जाने अनजाने  
समझने लगते हैं 
हम 
ज़िन्दगी को 
खेल 
गिने हुए 
चौंसठ 
काले सफ़ेद खानों का 
और 
फंस जाते हैं
ओहदों , 
कायदों 
और चालों के 
अज़ाब* में ..

लगती है 
हर इक बाजी 
खेली हुई सी ,
गोया खेलते हैं हम 
मुताबिक 
खुद की  
जानिबदारियों* के,
साथ लिए 
महज़ 
झूठी अना*,  
और 
सोचते हुए 
शिद्दत से
चंद 
नीयत नुक्तों को,
देने शह और मात 
हर उस 'दूसरे' को 
जो होता है महसूस 
साथी इस खेल का ...

आजमाते हैं 
तरकीबें कई 
बिना बदले 
सोच और चालें अपनी,
लगने लगती हैं 
वही बस 
पहचान हमारी
साबित करने को
लियाकत* हमारी ....

सुनो ! 
मत करो 
क़ैद खुद को 
किसी शतरंजी खेल में 
महदूद* हैं जहाँ 
मायने ज़िन्दगी के
फ़कत हार और जीत में ... 

परे इस खेल के 
बिखरे हैं 
रंग बहुतेरे 
मोहब्बत के,
करते ही महसूस 
हर शै में
जिनको ,  
होने लगता है
एहसास 
कुशादा*-ए-हयात* का
हैं हम 
महज़ छोटे से हिस्से 
जिसके..

मायने- 

अज़ाब-नर्क/torture  

जानिबदारी-पूर्वाग्रह/biased 

अना- अहम/Ego

लियाकत-काबिलियत/capability

महदूद-सीमित/limited

कुशादा -विस्तृत /limitless 

हयात-ज़िंदगी /life