शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

गृहिणी......


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अधमुंदी आँखों से
सूर्य की
प्रथम किरणों के
स्पर्श को
महसूसते हुए
होती है
शुरुआत
एक गृहणी के
दिन की...

छोड़ कर
गर्माहट
रजाई की
उठना ही है ,
नहीं होगा
हाज़िर
सामने उसके
कोई
लेकर
एक प्याली
भाप उड़ाती
चाय की...

होती है
शुरू फिर
एक
अनवरत
जिंदगी,
बंधी हुई
सुइयों से
घड़ी की ...

बन जाती है
बस यही
बंदगी उसकी,
घूमते घूमते
इर्द गिर्द
परिवार के,
मान बैठती है
धुरी खुद को
निर्धारित कर
अपेक्षाएं
सभी की....


वृहत हितों के
कारन करती
अनदेखी
सूक्ष्म हितों की..
पूर्व स्वयं की
आशा से
बन जाती
प्राथमिकताएं,
अभिलाषाएं
परिचितों की ...

स्वपन
अनजीये
बन जाते
आहुति
गृहस्थी के
पावन -अपावन
यज्ञ में ,
तथापि
करते प्रतिपादित
प्रज्ञा हीन
उसे जब
होती स्थिति
तर्क-वितर्क की ....

कुंठित हो
फिर अनचाहा
हो जाता
घटित
अकस्मात ही,
निरुद्देश्य कही
बातें अनजाने
कर देती
हृदय पर
घात प्रतिघात भी ....


फड़फड़ा कर
पंख
रह जाता
पंछी मन का
बेचारा ,
गृहिणी हो कर
क्यूँ तूने
आकाश
स्वयं का
हारा ???

छोड़ परिधि को
विस्तृत कर
अंतस दृष्टि
अपनी,
सत्व छुपा
नारीत्व का
ममतामय
तू ही तो है
जननी ......

घर बनता है
स्नेह से तेरे
जो कल था
दीवारें,
कण कण
खिल उठता है
पा कर
तेरे सुकोमल
सहारे...

किन्तु
खो देना
निज को
धर्म नहीं
गृहिणी का,
चेतन खुद को
रख कर ही
कर तू
संपादन
कर्तव्य का...

खो कर निज को
गृहस्वामिनी
गृह सेविका
सम हो जाती,
बिना पारिश्रमिक
बिना मान के
क्रमशः
विषम हो जाती...

पीड़ा इस
निर्मात्री की
अनुभव
काश कोई
कर पाता,
ईश्वर से पूर्व
सम्मुख उसके
शीश
सब का
झुक जाता....


गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

लम्हों में.....

वो जाते जाते तेरा ,
ठिठक कर यूँ ही रुक जाना
निगाहों से गुज़र कर ,
रूह तक मेरी चले आना
पिघलना बाहों में मेरी ,
मुझे संग खुद के पिघलाना
डुबो कर इश्क में खुद को ,
उसी शिद्दत से खो जाना
ना आगत का ,ना था गुज़रे
किन्ही लम्हों का जो हासिल
वही इक लम्हा था तुझ में ,
उसी को मुझ में जी जाना

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

आंखमिचौनी

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खेलें हम तुम आँखमिचौनी
दिन बचपन के जी लें साथी...
कभी छुपो तुम नज़र से मेरी
छुपूँ कभी मैं तुमसे साथी ....!!

आसमान के विस्तृत तल में
चंचल बादल सा ढल जाओ
तरह तरह के रूप बदल तुम
हैराँ मुझको कर इठलाओ
खोजूं नेह भरा मैं बादल
जानूं वो ही तुम हो साथी ...
कभी छुपो तुम नज़र से मेरी
छुपूँ कभी मैं तुमसे साथी ....!!

कभी मैं बन के बुलबुल प्यारी
मिल जाऊं उड़ती चिड़ियों में
कभी बनूँ तितली बगिया की
छुप जाऊं खिलती कलियों में
चहक सुनो तुम, महक से पूछो
छुपी कहाँ मेरी है साथी ....??
कभी छुपो तुम नज़र से मेरी
छुपूँ कभी मैं तुमसे साथी ....!!

बचपन का ये खेल अनोखा
आज भी मन को कितना भाता
रोम रोम में प्रिय बसा कर
हर शै में फिर ढूँढा जाता
छुअन पवन की ,ताप सूर्य का
सबमें तुम होते हो साथी.....
कभी छुपो तुम नज़र से मेरी
छुपूँ कभी मैं तुमसे साथी ....!!
खेलें हम तुम आँखमिचौनी
दिन बचपन के जी लें साथी.......



गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

शहीद-ए-वफ़ा


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पिघलती है
औ' जलती है
कतरा कतरा
शब् भर
शमा
इश्क के
इंतज़ार में...
फ़ना
लम्हे में
हो कर
कहलाता
शहीद-ए-वफ़ा
परवाना
इस
प्यार में ...

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

महक

मेरी प्यारी दोस्त 'महक ' के लिए .........

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खिलते हैं प्रतिदिन कई पुष्प यहाँ
'महक' बिना किन्तु , है खुशबू कहाँ

गमकती बयार सी मन को महकाती
होने से उसके , हंसी लब पे थिरक जाती

सूना सा लगता 'अभिव्यक्ति' का चमन
'महक' ना कर पाती यहाँ गर रमण

गहनता सागर सी, नदी सा प्रवाह
ज्ञान अपनी नैनो में भरती अथाह

स्नेह से अपने है सबको यूँ बाँधा
बिन उसके सब कुछ लगता है आधा

चहकती फुदकती वो बुलबुल चमन की
भिगो देती है परते सभी अंतर्मन की

क्षणिक से ही आने से उसके यहाँ
चटकती हैं गुलशन में नयी कलियाँ

दुआ दिल से लब तक चली बस ये आये
'महक' से सदा हर चमन मुस्कुराये


रविवार, 17 अक्टूबर 2010

धुरी ....

केंद्र पर स्थिर
तनी हुई धुरी
नियति के अनुरूप
करती संतुलित
अपने इर्द गिर्द
घूमते
चाक को ...
क्षणिक विचलन
बना देता है
दोषी उसको
सारी
अस्त्व्यस्तताओं का...
नहीं अधिकार
विचलित होने का
नितांत एकाकी
धुरी को
क्यूंकि
स्थिरता उसकी
कराती है
कुम्हार के हाथों
दोषरहित सृजन .....




शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

विलय ...

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एक ही छत के नीचे
दो पृथक अस्तित्व
कोशिश में
बचाने की
अपने
मिथ्या वजूद को
बचते हैं
सामने भी
पड़ने से
एक दूसरे के
अपने
असली चेहरे के साथ ...
टकराहट
'मैं'
और
'तू'
की
खड़े कर देती है
और भी
वृहद
'मैं'
और
'तू'
क्यूंकि
हो कर
आवरण हीन
'हम'
में विलय
जो नहीं हो पाते
वे कभी