शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

राज़ सृष्टि का....

हुआ सार्थक जीवन मेरा
मिला साथ जो तेरा
खुशियों से रीते हाथो को
मिला हाथ जो तेरा

महसूस किया तेरे होने को
हुए जो कम्पन मन में
सुना है मैंने उन बातों को
आवाज़ न होती जिनमें

साथ मिले पल भर का या फिर
जीवन बीते सारा
भरा प्रेम से मन गागर को
अमृत बन के तारा

अलग अलग दिखते हैं जग को
भेद है ये दृष्टि का
जुडी है रूहें किस बंधन से

राज़ है ये सृष्टि का

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बुधवार, 30 जून 2010

आब-ए-वफ़ा...

पिघलता है
जब
तुमसा
हिम खंड,
मोहब्बत की
तपिश से

उफन उठता है
एहसासों से
भरा,
मेरे दिल का
दरिया

हो उठता है
हर ज़र्रा,
हरा भरा,
और पुरनूर

जब होता है
वाबस्ता,
उस
आब-ए- वफ़ा
से .....

सोमवार, 28 जून 2010

वक्त के पंख....

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वक्त भी
थम
गया है
दरवाजे पे
टिकी
मेरी
नज़रों
की तरह

आओ न..!!
आ कर
पंख
दे दो
इसको
मुद्दते
हो गयी
इसको
भी
उड़े हुए ....

रविवार, 27 जून 2010

क्या समझे ..

सरे-महफ़िल रकीबों  की,उन्हें हम आशना समझे
हम उनको देखो क्या समझे थे और वो हमको क्या समझे

अयाँ  हो ही गया ,कुछ इस तरह से ,हाल भी उन पर
निगाहों से गुज़र  कर दिल के जज्बों का बयां समझे

बिखर उठे हैं हर सूं बन के खुशबू मेरी  रातों की
हमीं   नादाँ  तेरे  ख्वाबों को पलकों में निहां समझे
 
कफस  में रहते रहते हो लिए सैयाद से मानूस
रिहाई ठुकरा देने से वो हमको नातवां समझे

वफ़ा का पास न तुझको मेरी ,फिर भी ए जानम
सितम ये क्या ,रकीबों को भी अब तू बा-वफ़ा समझे

हंसी को देख  कर उनकी कहीं धोखा न खा जाना
तब्बसुम में छिपे हैं गम ,जिन्हें बस आशना समझे

मिलेंगे ख़ार भी, संग भी ,चलोगे जब मेरी जानिब
नहीं मिलते मोहब्बत के सफर में  कहकशां... समझे!!

शुक्रवार, 18 जून 2010

वार्तालाप-एक माँ का स्वयं से

नन्ही
पदचाप की
धीमी सी
आहट..
अनदेखे
स्पंदनो
की
प्यारी सी
सुगबुगाहट ..

पुत्र  की
आस में
चौथी बार
यह आहट है
आशंकित है
मन
ह्रदय में
छटपटाहट है ..

क्यूँ हूँ
मजबूर
वंश बेल
बढ़ाने को
बेटियों का
छीन
अधिकार
क्यूँ उनको
न पढ़ाने  को

मासूम सी
आँखों में
अनगिनत
प्रश्न हैं
सिर्फ पुत्रों
के आने
का ही
मनता क्यूँ
जश्न है

समझेगा
बोझ
कब तक
बेटियों को
यह ज़माना..
बेटों  से
बढ़ कर
माँ-बाप
का दुःख 
है उन्होंने
पहचाना ..

मूक समर्थन
मेरा,
पुत्र की
व्यर्थ
चाह में
बो  रहा है
कांटे
मेरी
बेटियों की
राह में ..

नहीं दे कर
उनको
जीवन का
सुदृढ़ आधार
स्वयं
कर रही हूँ
अपनी सी
तीन पौधें
तैयार ..

नहीं  !!
अब नहीं
सहूंगी
और यह
अनर्थ..
बनाऊँगी
बेटियों
को
इतना मैं
समर्थ ..

स्वयं
लहलहाएंगी वे
पूर्ण विकसित
तरु सी... 
कर देंगी
उसको भी
उर्वर,
भूमि
हो गर
मरू सी ..

सृष्टि का
आधार है
बेटी
दे कर
उसको
उचित
सम्मान..
बने  राष्ट्र
सुदृढ़
समग्र
यह
दिश  दिश
हो इसकी
पहचान ...

मंगलवार, 15 जून 2010

निर्बन्ध प्रयास...


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दे दिया
जाता है
नाम
जब
एहसास
को
एक
रिश्ते का
झुठला
जाता है
अस्तित्व
भी
प्रेम के
फ़रिश्ते का ...

हो जाते हैं
दफ़न
जिए थे
साथ
जो क्षण ,
करते हुए
एक दूजे का
अन्वेषण ..
रह जाता है
शेष बस
रिश्तों में
बंधा
एक
तुलनात्मक
विश्लेषण ...

घुट जाता है
दम
उस
पृथक
व्यक्तित्व का
देखा था
सपना
जिसने
सह-अस्तित्व का ...

प्रेम
नहीं
कभी
परिभाषाओं
में
ढल
सकता..
बहता
दरिया
कैसे
रह
अविचल
सकता ...

करना है
गर
ह्रदय में
विकसित
प्रेम
के
एहसास
को ...
निर्बन्ध
हो कर ,
करो
सार्थक
खिलती
रूहों के
सहज 
प्रयास को ....


.........

सोमवार, 14 जून 2010

छद्म प्रभुता ...

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प्रभुता स्वयं की
सिद्ध करने को
हीन कहा
दूजे को तूने

गिरा किसी को
सोचा ,पहुंचूं ,
आस्मां को
लगूं मैं छूने

पर उत्थान
स्वयं
का होता
जब शक्ति
होती
निज मन में

उपक्रम हो
आगे बढ़ने का
सजग
दृष्टि से
इस
जीवन में