गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018

छोटे छोटे एहसास


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संजो कर
ख़्वाहिशों में
तुझको,
चलन दुनिया के
बदस्तूर निबाहे
जा रहे हैं हम ..….....

रविवार, 14 अक्टूबर 2018

एकमेव

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दी है दस्तक
हौले से
ब्रह्ममुहूर्त में ,
शरद ने
दर पे वसुधा के ..

भीगी सी हरीतिमा
घुल गयी है
साँसों में मेरी
महकाते हुए
मन प्राण मेरा ...

है प्रयासरत
प्रथम रवि-किरण
भेदने को
किला कुहासे का ....

लपेटे हुए
चादर धुंध की
कर रहे हैं
वृक्ष
उद्घोषणा
शीत के आगमन की..

धुंध और हरियाली
हलके से उजास में
जैसे कर रहे हों
प्रतिबिंबित
मेरे ही
हृदय  के भावों  को ..

एक नम सी अनुभूति
बिछोह की तेरे
पा कर विस्तार
मेरे अंतस से,
मानो पसर गयी है
ओस बन कर
कण कण पर,
और
यूँ हो गयी हूँ
एकमेव मैं
प्रकृति से
अस्तित्व से .......

बुधवार, 10 अक्टूबर 2018

'वो'


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हाथों में 'जोत' लिए
'देवालय' से
बढ़ी थी वो
सुनहरी दमक में
रूप के
परवान चढ़ी थी वो
मारियम सी
गिरजे के बाहर
रोशन करने
कायनात को
खड़ी थी वो
या किन्ही आँखों के
फ्रेम में
तस्वीर सी
जड़ी थी वो....

रविवार, 7 अक्टूबर 2018

यूँही बेबात

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मिल जाना अपना
यूँ ही बेबात
और फिर
कभी ना ख़त्म होने वाली
बातों की शुरुआत,
परे है
हर मन्तक
और
बहस मुसाहिबे से....😊

शनिवार, 6 अक्टूबर 2018

ख़्वाबों की मानिंद


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चलो मिल लेते हैं
मुंदी हुई
पलकों के पीछे
ज़ेहन के गलियारों में
ख़्वाबों की मानिंद ....

न होगी ख़बर
किसी को फिर
अपनी मुलाकात की ....

कुछ कह लेंगे अबोला
कुछ सुन लेंगे अनकहा
बस इतनी सी तो
जुंबिश है हर बात की....

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018

इबादत मेरी.....


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नवाजिश करम और इनायत तेरी
तुमको जीना हुआ इबादत मेरी ...

हँसी होठों पे दिल में दर्द लिए
क़ाबिले दाद है लियाकत मेरी ...

रोकना कश्ती को ना है बस में उसके
मौजे सागर से अब है बगावत मेरी ...

लाख आगाह किया वाइज़ ने मुझको
डूबना इश्क में ठहरी थी रवायत मेरी....

हर इक इल्ज़ाम पे सर झुकता है
देगी गवाही खुद ही सदाक़त मेरी...

नाम शामिल था वफादारों में मेरा
आँखों में छलक आयी अदावत मेरी...

बुधवार, 3 अक्टूबर 2018

बेतकल्लुफ दोस्त


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कोई वक़्त 
मुकर्रर कर दे 
यादों का अपनी 
बेवक़्त चली आती हैं 
हवाओं में खुशबू सी
बेतकल्लुफ दोस्त की मानिंद.....