बुधवार, 3 अक्टूबर 2018

बेतकल्लुफ दोस्त


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कोई वक़्त 
मुकर्रर कर दे 
यादों का अपनी 
बेवक़्त चली आती हैं 
हवाओं में खुशबू सी
बेतकल्लुफ दोस्त की मानिंद.....

शनिवार, 29 सितंबर 2018

मोम हूँ....

 ( मुझको इस रात की तन्हाई की धुन पर)
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जिस्म को रूह के पोशीदा रहे राज़ न दो
छेड़ पाये ना तराना-ए- दिल वो साज़ न दो.....

तेरी हसरत में गुज़ारी है शबे ग़म जग के
नींद आई है दर-ए- सहर पे,आवाज़ न दो ...

वस्ल रूहों का ना पाबंद हुआ जिस्मों से
है ये अंजाम-ए-मोहब्बत नया आगाज़ न दो ...

हमनशीं हो तुम ही हमराज़ हो मेरे जानां
ना चटक जाए ये दिल गैर से अंदाज़ न दो ....

जब निगाहों से ही जज़्बात छलक जाते हैं
नग़्मों में ढलती हैं ख़ामोशियाँ अलफ़ाज़ न दो ....

है निगाहों की मुझे नर्म तमाजत काफ़ी
मोम हूँ संगतराशी के सख़्त अंदाज़ न दो ....

है नज़र सू-ए-फलक ,उड़ना मगर नामुमकिन
पंख पे जीस्त रुकी है अभी परवाज़ न दो .....

गुरुवार, 27 सितंबर 2018

भगवान नहीं ....


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रिश्तों के
अनचाहे मेले
खेल बहुत से
जिसमें खेले
नहीं हूँ
शामिल
अब बाजी में
बुजदिल हूँ
जाँफ़िशान नहीं....

जग रखता क्यों
मुझसे आशा
गढ़ गढ़ कर
खुद की परिभाषा
भूल कोई भी
हो सकती है
इन्सां हूँ
भगवान् नहीं ......

मकसद मेरा
खुद को जीना
पहन पैरहन
झीना झीना
करूँ लड़ाई
झूठ से कैसे
निर्बल हूँ
बलवान नहीं....

साथ है तेरा
मेरी ताक़त
इश्क़ हुआ अब
मेरी इबादत
दर पे खड़ा
लिए झोली खाली
दीन बहुत
धनवान नहीं  ...

जाँफ़िशान- जान लुटाने वाला

बुधवार, 26 सितंबर 2018

क्यूँ कर है....


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अंजाम-ए-इश्क़ अजीब क्यूँ कर है!!..
हासिल इसको सलीब क्यूँ कर है!!....

है नहीं वो मेरी लकीरों में
फिर भी मेरा नसीब क्यूँ कर है !!...

उसकी फ़ितरत नहीं मोहब्बत की
ग़ैर सा वो अदीब क्यूँ कर है !!..

हाथ छूटे ज़ुबाँ भी तल्ख़ हुई
दिल में अब भी रक़ीब क्यूँ कर है!!..

ख़ामुशी उसकी ज़ुल्म है मुझ पर
ऐसा ज़ालिम हबीब क्यूँ कर है !!!...


मंगलवार, 25 सितंबर 2018

क्या कहिये .....


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किया ज़िन्दगी में शामिल
हमपे ये इनायत क्या कहिये...
सरे बज़्म छेड़ती हैं
आँखों की शरारत क्या कहिये ...

नज़रों से समेटा मुझको
मूँद ली फिर पलकें
महबूब का मेरे, वल्लाह
अंदाज़े हिफाज़त क्या कहिये ....

ख़ामोशी ज्यूँ गा रही है
धड़कन में बसी ग़ज़लें
दरिया-ए - जज़्बात के
बहने की नफ़ासत क्या कहिये.....

रूहों का मिलन अपना
तोहफ़ा है इलाही का
तू मैं हूँ के मैं तू है
अपनी ये शबाहत क्या कहिये .....

रोशन है हर इक ज़र्रा
मशरिक़ से उठा सूरज
इक नूर बरसता है
इस दिन की वज़ाहत क्या कहिये.....

मायने -
शबाहत -similarities
वज़ाहत - भव्यता/सुंदरता

भूलना मुझको भी आसान नहीं...


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उदास हो रही है ख़ामोशी
सुन के उसको ,
कुछ उसको सुना कर जाना.....

भूलना मुझको भी
आसान नहीं है हमदम
मेरी यादों से मगर
खुद को मिटा कर जाना.....

सोमवार, 24 सितंबर 2018

छुअन...

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छुअन से
तेरे एहसासों की
पिघल रहा है
वजूद मेरा
और
बह रहा है
बाज़रिया आँखों के