पूजा मेरी हो स्वीकार
तब होगा मेरा उद्धार
तीन लोक के हे संचालक !
तार ले मुझको तारणहार ...
क्रोध,कामना,अहम् ,विद्वेष
रहे हृदय में कभी ना शेष
तेरे चरणों में कर अर्पण
खाली हो मेरा घर द्वार
तार ले मुझको तारणहार ....
खाली घर में जोत जलाऊँ
तेरी प्रीत की लगन लगाऊँ
मुंदी हैं पलकें ,भाव समर्पित
नहीं हैं शब्दों का व्यापार
तार ले मुझको तारणहार ...
अश्रु जल से चरण पखारूँ
हृदय कमल मैं तुझ पर वारूँ
सर्वस्व किया अब तुझको अर्पण
तुम्ही नाव लगाओ पार
तार ले मुझको तारणहार ....