मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

तार ले मुझको तारणहार ...

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पूजा मेरी हो स्वीकार
तब होगा मेरा उद्धार
तीन लोक के हे संचालक !
तार ले मुझको तारणहार ...

क्रोध,कामना,अहम् ,विद्वेष
रहे हृदय में कभी ना शेष
तेरे चरणों में कर अर्पण
खाली हो मेरा घर द्वार
तार ले मुझको तारणहार ....

खाली घर में जोत जलाऊँ
तेरी प्रीत की लगन लगाऊँ
मुंदी हैं पलकें ,भाव समर्पित
नहीं हैं शब्दों का व्यापार
तार ले मुझको तारणहार ...

अश्रु जल से चरण पखारूँ
हृदय कमल मैं तुझ पर वारूँ
सर्वस्व किया अब तुझको अर्पण
तुम्ही नाव लगाओ पार
तार ले मुझको तारणहार ....

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

इक पीर उठी उर से साजन ...


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इक पीर उठी उर से साजन ,
अँखियाँ भर बरसीं ज्यूँ सावन,
जब विलग हुई तेरे भावों से,
मन उपवन ज्यूँ लागे कानन .......

आखर आखर में छिपा के मैं
निज भाव हृदय के बतलाऊं
गीतों में मुखरित प्रेम तेरा
पा कर फिर खुद पर इठलाऊं
है क्षणिक प्रिय ,अवसाद मेरा
बह जाता, संग अश्रु-प्लावन
इक पीर उठी उर से साजन
मन उपवन ज्यूँ लागे कानन

जो उमड़ घुमड़ कर आये थे
श्यामल मेघा वो रीत गए
निरभ्र नील गगन सा मन
क्षण दुविधाओं के बीत गए
कर जाती निर्मल ,शुभ्र ,स्वच्छ
बहे धार प्रीत की जब पावन
इक पीर उठी उर से साजन
मन उपवन ज्यूँ लागे कानन .....



गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

दो क्षणिकाएं .....

साजिश ..

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शब्द लड़े ,
बात बढ़ी ,
घुटे भाव
और
छूटा साथ ...
साजिश में
फंस
अहम् की
देखो
हम बैठे
अब
रीते हाथ.....

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क्यूँ होता है ऐसा....

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रखता नहीं
महत्व
जो ,
कुछ भी
दरमियाँ ...
देता
वही
उजाड़
क्यूँ
रिश्तों का
गुलसितां

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

होने को मुक्कमल ....

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तोड़ कर जाल
इन उलझते हुए
बेमानी से
लफ़्ज़ों का ,
चलो आओ जानां !!
भर के बाँहों में
इक दूजे को ,
बिखरने दें
स्पंदन
ख़ामोशी के,
दरमियाँ हमारे ....
दरकार नहीं
कुछ ज़्यादा की
इससे ,
जीने को
हो कर
मुक्कमल
इस गुज़रते हुए
लम्हें में....



शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

पलकें...

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सिमट आते हैं

कई ख्वाब

मुंदी

पलकों में

मेरी ...

थिरक जाती है

लबों पर हंसी

जी कर उन्हें

पलकों के तले..

सांसें भी

महक उठती हैं

रात की रानी

की तरह...

ए शब् !

ठहर जा अभी ..

ज़रा

कुछ वक्त तो दे

जीने को मुझे

'मैं'

हो कर..

होना है

पराया

मुझे

खुद से ही

होते ही सहर

संग

खुली पलकों के ....




बुधवार, 6 अप्रैल 2011

हिज्र ...

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है सहरा
हिज्र का
कैसा ये
जालिम!!
कि अब तो
अश्क भी
खुश्क
हो चले हैं...
तपिश
बढ़ती गयी
हर ज़र्रा ज़र्रा,
कि देखो
आग बिन
हम
यूँ जले हैं!!!!

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

तुमसे है .....

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खिली जो
मेरे होठों पे ,
वो मुस्कान
तुम से है...
नमी पलकों पे
आ ठहरी ,
बनी अनजान
तुम से है ..

लिखे हैं
जो भी नगमें,
या कि नज्में ,
या कही गजलें
कि सबमें
ज़िक्र बस तेरा ,
वो हर उन्वान
तुमसे है ...

छुपे हो ,
आज तुम,
नज़रों से मेरी ,
पर
समझ लो ये
मेरी हर सांस की,
हर आस की,
पहचान
तुमसे है..

तुम्हारी बेरुखी
न सोख दे
बहता हुआ
दरिया ,
कि बढ़ के
ले लो बाहों में
यही अरमान
तुमसे है ....

तेरी हसरत में
भूले हम
खुदा को
और
खुद को भी,
हसीं रातें ,
महकते दिन ,
मेरा जहान
तुमसे है .....