मंगलवार, 17 नवंबर 2009

महक

महक
फूलों की
नहीं
बंधती
चमन की
झूठी
बाड़ों में ..
नहीं
होती है
वो परतंत्र
कभी भी
इन
किवाड़ों में..

नहीं होता है
नियत लक्ष्य
कहाँ जाना
मिले किसको..
न कोई
होता पैमाना
किसे कम या
अधिक किसको

बसी है वो
हवाओं में
बने उसका
जो दीवाना..
भरे आनंद
उस
मन में
जगा दे
इक नया
सपना

बना ले
रूह को
अपनी
महक
ऐसे ही
गुलशन की...
उड़ा दें
दूर तक
खुशबु
हवाएं
तेरे
जीवन की

करो
कुछ ऐसा
जीवन में,
चमन
खिल जाए
हर शै में...
करो न
रूह को
बंदी
किसी
तू-तू
औ'
मैं-मैं में....

रविवार, 15 नवंबर 2009

हस्ती मिट गई मेरी

जुड़े जो तार तुझसे,ये हस्ती मिट गयी मेरी
असर तेरे तस्सवुर का ,कि नींदें उड़ गयी मेरी

क़दमों में रवानी है,दिल में भी उमंगें है
जानिब तेरे चलने की,चाहत बढ़ गयी मेरी

खिल जाए हँसी लब पर,सोचूं जो तेरी बातें
चुगली मेरे भावों की,निगाहें कर गयी मेरी

उतरी हूँ जाने कैसे , बहर-ए-इश्क में दिलबर
खुद ही तेरे धारे में, कश्ती बढ़  गयी मेरी

शब बीते,सहर कब हो,क्या फर्क मुझे जानां
आके तेरी बाँहों में,  घड़ियाँ थम  गयी मेरी

हर लम्हा सजा लूँ मैं,बस तेरे ख़यालों से
कुछ और न करने की,हसरत रह गयी मेरी

सोमवार, 9 नवंबर 2009

अरमान मेरे दिल के

संग वक़्त-ए-धार के ख़यालात बदल जाते हैं
लोग गिरते हैं मगर गिर के संभल जाते हैं

लांघते हैं दर्द जब, मासूम हदों को दिल की
सूनी सूनी इन आँखों में मोती से मचल जाते हैं

दुनियावी रवायत से डर कर जो बने रिश्ते
हलकी सी इक ठोकर से बेवक्त बदल जाते हैं

तीरों ने ज़माने की दिए ज़ख्म मेरी रूह को
आके तेरी पनाहों में सब घाव सहल जाते हैं

महफिल से उठे,और यूँ चले आए तेरी जानिब
सुरूर-ए-मोहब्बत में, बढ़े पांव फिसल जाते हैं.

राहें तो मेरी बदली, मंजिल का पता वो ही
अरमान मेरे दिल के शायद ही बदल पाते हैं.

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

मिलन.....(आशु रचना)

उम्र कोई हो
देश कोई हो
काल कोई हो
क्या करना
तेरे भावों ने
इस दिल का
श्रृंगार किया
बन के गहना

रही तडपती
एक बूँद को
जैसे हो मीन
समुन्दर में
बदरी घिर घिर
कर न बरसी
चातक देखे
अम्बर में
बरसाया जो तूने
अमृत
उस के स्वाद का
क्या कहना
दिल से दिल के
तार जुड़े जब
दूरी तुझसे
क्या सहना

मिलन आत्मा का होता है
देह तो नश्वर होती है
साधन होता
साध्य कभी भी
मंजिल
परमेश्वर होती है
रूह से रूह का
मेल हुआ जब
देह भावः में
क्या बहना
तेरे भावों ने
इस दिल का
श्रृंगार किया
बन के गहना .........

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

स्वयम्भू...

बन बैठा स्वयम्भू मालिक तू
निश्चित कर निज के अधिकार
कभी न जाना क्या है मन में
छद्म दृष्टि से देखा संसार

हर कृत्य होता इसी भावः से
अच्छे से अच्छा बन पाऊँ
दुनिया मुझको खूब सराहे
नज़रों में सबकी चढ़ जाऊँ

पूरी करने हर एक अपेक्षा
करे प्रयत्न जी जान से तूने
फिर भी मन संताप में डूबा
ख़ुशी हृदय न पायी छूने

निज से जब पहचान हुई तो
गिरी दीवारें मान्यताओं की
कब से था सहमा सकुचाया
चिंता थी बस भर्त्सनाओं की

भर्त्सना मिलती तुझको प्राणी
दृढ़ता जब न होती मन में
कभी इधर ,कभी उधर को डोले
बदल जाये हर पल हर क्षण में

सुन तू अपने अंतर्मन की
कभी न देगा गलत सलाह
छुपा वहीँ बैठा है मालिक
तू पायेगा उसकी राह..........

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

भराव

मूँद के आँखें
मूढ़ !!!!!
भरे प्याले में
उन्डेले जा रहा है
तरल
बासी भराव को
बिना किये खाली
कैसे समाएगा
ताजा अमृत
उसमें.....

रविवार, 1 नवंबर 2009

अनजाने रिश्ते

कहनी क्या हैं सुननी क्या है
बातें सब जानी पहचानी
दिल से दिल तक आने वाली
कब होती राहें अनजानी

फिर भी मन शब्दों में ढूंढें
तेरे अंतस के भावों को
रिक्त रहे कोई एक कोना
भर न पाए कुछ घावों को

मरहम तेरे स्नेह का लगता
पर इच्छा बढ़ती ही जाए
करूँ प्रतीक्षा पल पल तेरी
नज़र ख्वाब गढ़ती ही जाए

महसूस करूँ हर लम्हा खुद में
ज़हन पर ऐसा है छाया
दिल की धड़कन में,सांसों में
क्या तूने भी मुझको पाया !!!

कैसे कब जुड़ गया ये नाता
न मैं जानू न तू जाने
नाम कोई न होता इनका
रिश्ते ये होते अनजाने

इन रिश्तों को जी कर ही तो
पूरक होते भावः हृदय के
निज से निज का परिचय होता
बनते रस्ते स्वयं उदय के