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आ जाते हो ख़्वाब में
बन कर सच
हक़ीक़त से भी ज़्यादा
उतर के वजूद में मेरे
दिला देते हो यकीन
होने का अपने
खुलते ही नींद
खोजती हूँ तुमको
सहम जाती हूँ
तुम्हें
खोने के एहसास से
के तभी
कानों में हौले से
कह जाते हो तुम
अभी अभी तो मुझे तुमने
बना कर हमरूह
समा लिया था ना
तुम्हारे अपने वजूद में ,
कहाँ ढूंढ रही हो पगली
अब बाहर मुझको .....
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एक एहसास है वो
जो जगा देता है
मोहब्बत
सोई हुई मुझमें
सदियों से ,
और फिर
ज़िन्दगी जागती है
खिलती है
गाती गुनगुनाती है
लिपटे हुए
उस एहसास के होने से