शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

निश्चित है मिलन पिया से...


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मिलन की घड़ियाँ छोटी,
होता विरह तो लंबा है...

समा के खुद में साजन,
बिछोह उसका जीना है...

धड़कन गुंजारे पहलू में,
लब चुप ही रहता है...

अश्रुधार बहे नैनन से
फिर भी स्वप्न संजोना है ...

निश्चित है मिलन पिया से,
यह विश्वास ना खोना है...

एहसासात रूह के......


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आते हो तुम
कभी मेहमान
कभी अनजान
कभी अपने
कभी पराये
कभी गहन
कभी सतही
हो कर
और लौट भी जाते हो.....

कुछ कुछ रह जाते हो
फिर भी
कभी तरलता
कभी सरलता
कभी खुशबू
कभी छुअन
कभी तड़प
कभी सुकून
हो कर
बाकी मुझमें..

चाहती हूँ उतारना
खाली पन्नो पर तुमको
बाज़रिया कलम के
मगर कैसे उतरें
एहसासात रूह के
जिस्म से गुज़र कर .....

हमरूह......


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आ जाते हो ख़्वाब में
बन कर सच
हक़ीक़त से भी ज़्यादा
उतर के वजूद में मेरे
दिला देते हो यकीन
होने का अपने
खुलते ही नींद
खोजती हूँ तुमको
सहम जाती हूँ
तुम्हें
खोने के एहसास से
के तभी
कानों में हौले से
कह जाते हो तुम
अभी अभी तो मुझे तुमने
बना कर हमरूह
समा लिया था ना
तुम्हारे अपने वजूद में ,
कहाँ ढूंढ रही हो पगली
अब बाहर मुझको .....

रविवार, 18 अगस्त 2019

मुतमईन


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याद तेरी
पाँव का काँटा तो नहीं
निकाल दूँ
खींच के
जिसको
और हो जाऊँ मुतमईन
के ये टीस
कुछ ही पल तो है .......

सोमवार, 12 अगस्त 2019

बेवजह तो नहीं है.....


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इश्क़ में यूँ उतर जाना
बेवजह तो नहीं है,
इस दर्द से गुज़र जाना
बेवजह  तो नहीं है...

मुलाक़ात हुई खुद से
हुए जब तुम मुख़ातिब
रूह का सुकून पाना
बेवजह तो नहीं है ....

चाहे तू भी मुझे ऐसे
ये अना है या मोहब्बत
तेरी यादों में पिघल जाना
बेवजह तो नहीं है .....

तेरी चोटों ने तराशा
मुझमें वजूद मेरा
ज़र्रा ज़र्रा यूँ बिखर जाना
बेवजह तो नहीं है .....

हो जाऊँ फ़ना मैं अब
रब की है ये चाहत
हर साँस उसका तराना
बेवजह तो नहीं है....

वो एहसास


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एक एहसास है वो
जो जगा देता है
मोहब्बत
सोई हुई मुझमें
सदियों से ,
और फिर
ज़िन्दगी जागती है
खिलती है
गाती गुनगुनाती है
लिपटे हुए
उस एहसास के होने से

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

चार आँखों में....


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मिलना अपना
नहीं था न
कोई पहली बार
मिलने जैसा ?
था वो तो
जी लेना फिर से
गुज़रे हुए लम्हात का...

एक एहसासे सुकूँ था
अपने बिछड़े हिस्से से
फिर हुई
मुलाकात का ,

अबोला  कहना
अनकहा सुनना
ओर न छोर था
बीच अपने किसी बात का...

पहचान कर
अपनी सी ताल को
बढ़े जा रही थी
धड़कनें
हो कर बेकाबू,
इल्म न था उनको
किसी वक़्ती एहतियात का,

जन्मों की जानी चिन्ही
महक थी
हर सूं मेरे
ना, ना!
ये तो समाई थी
मुझमें ही ,
उतर आया था
चार आँखों में
एक समन्दर
उमड़े हुए जज़्बात का...