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छूट जाता है
बचपन
उस आँगन के
छूटने के साथ ही
जहाँ खेली थी
लाडली
गुड्डे गुडिया ....
जीती है
यथार्थ
जिसमें
जीवन नहीं
खेल
महज़
गुड्डे गुडिया का ...
किन्तु
जाते ही
नैहर
मिलती है
छाँव जब
माँ के आँचल की
बन जाती है
फिर से
वही नन्ही बच्ची
होती है
खुश जो
नन्हीं नन्ही
बातों पर .......
छूट जाता है
जब वो ही नैहर
होते ही
दिवंगत
माता -पिता के
होने लगता है
एक बेटी को
महसूस
कि जैसे
छीन ली हो
किसी ने
वो धरती
जहाँ थी
उसकी जड़ें
जहाँ बीता था
उसका अनमोल
बचपन .....
तपते सूरज से
किसी पल में
तरसती है
फिर लाडो
अपना कहे
जाने वाले
किसी सुखद
ठौर के लिए
जहाँ मिल सके
उसे
माँ के आँचल की सी
शीतल छाँव ....
बंध गयी हैं हदें
अपने
वक्त-ए-गुफ्तगू की
जबसे
फेर लेती हूँ
तेरी नज़्मों को
तस्बीह के दानों सा ,
और यूँ जप लेती हूँ
हर उस लम्हे को
जो गुज़ारा था
हमने
बोला अबोला
जिसके
पाकीज़ा एहसास,
अनकहे अल्फाज़ से
जन्मी थीं
नज्में बेहद .....