मंगलवार, 18 सितंबर 2018

नैहर

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छूट जाता है
बचपन
उस आँगन के
छूटने  के साथ ही
जहाँ खेली थी
लाडली
गुड्डे  गुडिया ....

जीती है
यथार्थ
जिसमें
जीवन नहीं
खेल
महज़
गुड्डे गुडिया का ...

किन्तु
जाते ही
नैहर
मिलती है
छाँव जब
माँ के आँचल की
बन जाती है
फिर से
वही नन्ही बच्ची
होती है
खुश जो
नन्हीं नन्ही 
बातों पर .......

छूट जाता है
जब वो ही नैहर
होते ही
दिवंगत
माता -पिता के
होने लगता है
एक बेटी को
महसूस
कि जैसे
छीन ली हो
किसी ने
वो धरती
जहाँ थी
उसकी जड़ें
जहाँ बीता था
उसका अनमोल
बचपन .....

तपते सूरज से
किसी पल में
तरसती है
फिर लाडो
अपना कहे
जाने वाले
किसी सुखद
ठौर के लिए
जहाँ मिल सके
उसे
माँ के आँचल की सी
शीतल छाँव ....

और हो जाती है
तब वो
हमेशा के लिए
बड़ी ......

रविवार, 16 सितंबर 2018

पागलपन


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मेरे पागलपन में
तेरा
यूँ पागलों सा
घुल जाना ,
समझदारी को
करता है
अक्सर
मजबूर
देखने को आइना .....😊

बोला-अबोला



बंध गयी हैं हदें
अपने
वक्त-ए-गुफ्तगू की
जबसे
फेर लेती हूँ
तेरी नज़्मों को
तस्बीह के दानों सा ,
और यूँ जप लेती हूँ
हर उस लम्हे को
जो गुज़ारा था
हमने
बोला अबोला
जिसके 
पाकीज़ा एहसास,
अनकहे अल्फाज़ से
जन्मी थीं 
नज्में बेहद .....

बुधवार, 8 अगस्त 2018

"नादाँ मैं"

अंजुरी भर के 
मोती
लाया था कोई
सागर तल से 
और मैं
लहरों की फेंकी 
टूटी सीपियाँ 
चुनने में व्यस्त थी....

गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

कभी हँसी बन झरती पीर....

जीवन अपना
जलधि जैसा
अथाह असीम
तरल ज्यूँ नीर,
कहीं चपलता
लहरों जैसी
कहीं बहुत
गहन गम्भीर ,
कहीं शांत है
बिलकुल मौन
कहीं सुरों सम
बजते तीर,
कभी परिपक्व
अबोल धैर्य है
कभी बालक
चंचल अधीर
सरल सहज
भावों का समन्वय
मिलन ,बिछोह
बेताबी ,धीर
कभी खुशी से
बहते आँसू
कभी हँसी बन
झरती पीर.....

रविवार, 7 जनवरी 2018

मुश्किल क्यों है आसां होना


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बेहिस भीड़ में इन्सां होना
मुश्किल क्यों है आसां होना....

तक़रीरें होती बात बात पर
जीते हैं बस शहो मात पर 
चतुर सुजानो की बस्ती में
कितना मुश्किल नादां होना....

मज़हब के झूठे अफ़साने 
लगे हैं ज़ेहन को भरमाने
हर शै पाएं कृष्ण मोहम्मद
मुश्किल इसका इमकाँ होना....

रूहें हैं जन्मों की संगी
जिस्म भले मशरे के बंदी
इश्क़ में उनके इश्क़ हो गए
मुश्किल अब तो मिन्हा होना.....

दुनिया जिसको टोक न पाए
राह तारीकी रोक न पाए
रोशन खुद जो जलवा हो कर
मुश्किल उसका पिन्हा होना.....

मायने-

बेहिस-असंवेदनशील
इमकाँ-संभावना
मशरे-समाज
मिन्हा-कम
तारीकी-अंधेरा
पिन्हा-छुपा हुआ

छोटे छोटे एहसास


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ख़्वाबों में 
बन हक़ीक़त 
चले आते हो क्यूं.
छुअन से 
रौं रौं को 
जगाते हो क्यूं....
बढ़ाती हूँ हाथों को 
कि छू लूँ तुम्हें 
न हो कर भी यूँ 
पास आते हो क्यों......